उत्तराखंड हाईकोर्ट का फैसला और लोकतंत्र में फतवों की हकीकत —- शिबली रामपुरी का विशेष लेख

उत्तराखंड हाईकोर्ट का फैसला और लोकतंत्र में फतवों की हकीकत —- शिबली रामपुरी का विशेष लेख

शिबली रामपुरी
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में सामाजिक संगठनों,सामाजिक समूहों,धार्मिक समूहों,धार्मिक संस्थाओं और न्याय पंचायतों द्वारा दिए जाने वाले सभी फतवों पर रोक लगा दी हैं। अदालत ने इसे सामाजिक प्रतिष्ठा और मौलिक अधिकारों के खिलाफ बताया हैं। अदालत ने ये फैसला हरिद्वार के लक्सर कस्बें में एक नाबालिग के गर्भवती होने के बाद पंचायत के उसके घरवालों को गांव निकाला देने का फरमान सुना देने के मामलें में सुनाया हैं। इस मामलें में अदालत के निर्णय में फतवे का जिक्र करने पर मुस्लिम विद्वानों ने ऐतराज जताया हैं। उनका कहना हैं कि अदालत द्वारा ये मामला जल्दी में दिया गया हैं। इस पर फिर से गौर किया जाना चाहिए। दूसरी ओर जमीयत उलेमा हिन्द के महासचिव मौलाना महमूद मदनी ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के द्वारा लगाए गए फतवों पर प्रतिबंध को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ बताते हुए कहा हैं कि इस मामलें पर जमीयत उलेमा सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करेगी। इस सारे मामले से पहले हमको इस पर भी गौर करने की जरूरत हैं कि आखिर फतवा क्या है और उसकी संविधान में क्या हैसियत हैं। फतवा अरबी का शब्द हैं जिसका अर्थ है मुस्लिम कानून के अनुसार किसी निर्णय पर दी जाने वाली राय। फतवा के बारें मे सबसे पहले ये समझना अति आवश्यक हैं कि फतवा ना तो कोई सामाजिक संगठन जारी कर रकता हैं और ना ही कोई पंचायत को ये अधिकार हैं कि वो किसी भी मामलें में अपनी राय को फतवा बता दे। यहां तक कि फतवा कोई मौलाना भी जारी नही कर सकता हैं। जिस तरह से आजकल मीडिया में किसी मौलाना के बयान को फतवा बताकर उस पर चैनलों पर डिबेट तक कराई जाने लगती हैं। जैसे कुछ दिन पहले किसी राज्य की एक मुस्लिम लडकी के नृत्य करने पर कुछ मुस्लिम उलेमा ने ये कहकर ऐतराज किया था कि जिस जगह वो लडकी अपना कार्यक्रम पेश करने जा रही है वहां पर करीब में कोई धार्मिक स्ािल है। इसलिए वो अपना कार्यक्रम वहां पेश ना करे जिसके बाद हमारे देश के कुछ मशहूर टीवी चैनलों ने ये कहना आरंभ कर दिया कि देखो इस मासूम लडकी के खिलाफ कितने फतवे दिए गए हैं। जब तक ये बात सामनें आई कि ये फतवे नही बल्कि कुछ मुसलमान उलेमा की अपनी राय थी तब तक मीडिया उस मामलें पर काफी हंगामा कर चुका था। ये कोई एक मामला नही हैं कि जब पर्सनल राय को फतवे का रूप दिया गया। कई बार तो यहां तक हुआ कि किसी मस्जिद के मौलाना या किसी नामवर मुस्लिम विद्वान के किसी राजनीतिक पार्टी के हक में आवाज बुलन्द करने को भी फतवा बताया गया। जबकि फतवा कुछ और ही होता हैं। यहां तक कि देवबंद दारूल उलूम जो फतवा देने के लिए मशहूर हैं। वहां पर भी हर उलेमा को ये अधिकार नही हैं कि वो फतवा जारी कर दे। फतवा देने के लिए दारूल उलूम में अलग व्यवस्था कायम हैं। जहां से फतवा जारी होता हैं। फतवा क्या होता हैं। इस पर बात करे तो फतवा किसी भी मामलें पर कुरान और हदीस का क्या नजरिया हैं ये फतवा होता हैं। फतवा एक मजहबी राय होती हैं और संविधान में इसे किसी पर भी जबरदस्ती लागू नही किया जा सकता हैं। जब भी कोई मुस्लिम किसी ऐसे मामलें में उलझ जाता हैं कि उसे ये समझ नही आता हैं कि इसमें इस्लाम क्या कहता हैं तो फिर वो दारूल इफता जहां से फतवा जारी होता हैं वहां पर वो सवाल करता हैं और वहां से जो जवाब दिया जाता हैं उसे फतवा कहा जाता हैं। भारत में फतवे की बात करें तो यहां पर लोकतंत्र हैं और कोई भी किसी को भी फतवा मानने के लिए बाध्य नही कर सकता हैं और ना ही उसे रोक सकता हैं। फतवा एक धार्मिक राय हैं और भारत जैसे काबिले तारीफ लोकतांत्रिक देश की ये खूबसूरती हैं कि यहां पर सबको अपने धर्म के मुताबिक जीवन गुजारने की पूरी आजादी हैं तो यदि कोई फतवे को मानता भी हैं तो भी ये उसे उसके संवेधानिक और लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित नही किया जा सकता हैं। जिस तरह का मामला फतवा जारी करने वालों पर हैं कि वो फतवा मांगने वाले पर ये शर्त नही लगा सकते हैं कि उसको फतवा मानना ही पडेंगा वरना उसको गांव छोडना पडेगा या उसका बायकाट किया जायेगा या फिर उसको इतने जूते मारने की सजा दी जायेगी। लेकिन पंचायतों के मामलें हमको ज्यादातर ऐसे नही लगते हैं क्योकि हम अक्सर अखबारों में पंचायत के ऐसे ऐसे फरमान सुनते हैं कि जिससे कानून को हाथ में लेने का साफ पता चलता हैं। कहीं पर कोई पंचायत किसी को गांव छोडने का हुक्म जारी कर देती हैं तो कहीं पर पंचायत के कहने पर किसी को जूते तक लगाने की सजा सुना दी जाती हैं। ऐसा नही हैं कि पंचायतों में काबिले तारीफ निर्णय नही लिए जाते लेकिन ये भी कडवी हकीकत है कि गांव छोडने और जूते मारने जैसी सजाए भी पंचायते खुद तय कर लेती हैं। जबकि किसी को भी ये अधिकार नही हैं कि वो कानून को हाथ में लेकर फेसला सुनाने लग जाए। जहां तक उत्तराखंड हाईकोर्ट के निर्णय की बात हैं तो इस पर मौलाना महमूद मदनी कहते हैं कि इस घटना का फतवे के साथ कोई संबध नही हैं। यह एक पंचायत

का फैसला था वहां किसी मुफती या आलिम का नाम भी नही हैं।

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