कत्ल.ए.हुसैन अस्ल में मर्ग.ए.यजीद है। इस्लाम जिंदा होता है हर करबला के बाद——– वाकिया-ए-करबला पर आरिफ नियाज़ी का तफसीली मज़मून

कत्ल.ए.हुसैन अस्ल में मर्ग.ए.यजीद है। इस्लाम जिंदा होता है हर करबला के बाद——– वाकिया-ए-करबला पर आरिफ नियाज़ी का तफसीली मज़मून


मोहर्रम इस्लामिक कैलेंडर के पहले महीने का नाम है। इसी महीने से इस्लाम का नया साल शुरू होता है। इस महिने की 10 तारीख को यौम.ए.आशुरा कहा जाता है।

मोहर्रम के महीने में हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नवासे इमाम हुसैन और उनके 72 अनुयाइयों का शहीद कर दिया गया था। हजरत हुसैन इराक के शहर करबला में यजीद की फौज से लड़ते हुए शहीद हुए थे।

इस्लाम में सिर्फ एक ही खुदा की इबादत करने के लिए कहा गया है। छल.कपट, झूठ, मक्कारी, जुआ, शराब, जैसी चीजें इस्लाम में हराम बताई गई हैं। हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इन्हीं निर्देशों का पालन किया और इन्हीं इस्लामिक सिधान्तो पर अमल करने की हिदायत सभी मुसलमानों और अपने परिवार को भी दी।

दूसरी तरफ मदीना से कुछ दूर शाम में मुआविया नामक शासक का दौर था। मुआविया की मृत्यु के बाद शाही वारिस के रूप में यजीद जिसमें सभी अवगुण मौजूद थे वह शाम की गद्दी पर बैठा।

यजीद चाहता था कि उसके गद्दी पर बैठने की पुष्टि इमाम हुसैन करें क्योंकि वह हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नवासे हैं और उनका वहां के लोगों पर उनका अच्छा प्रभाव है।

यजीद जैसे शख्स को इस्लामी शासक मानने से हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के घराने ने साफ इन्कार कर दिया था क्योंकि यजीद के लिए इस्लामी मूल्यों की कोई कीमत नहीं थी। यजीद की बात मानने से इनकार करने के साथ ही उन्होंने यह भी फैसला लिया कि अब वह अपने नाना हजरत हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का शहर मदीना छोड़ देंगे।

इमाम हुसैन हमेशा के लिए मदीना छोड़कर परिवार और कुछ चाहने वालों के साथ इराक की तरफ जा रहे थे। लेकिन करबला के पास यजीद की फौज ने उनके काफिले को घेर लिया। यजीद ने उनके सामने शर्तें रखीं जिन्हें इमाम हुसैन ने मानने से साफ इनकार कर दिया। शर्त नहीं मानने के एवज में यजीद ने जंग करने की बात रखी।

यजीद से बात करने के दौरान इमाम हुसैन इराक के रास्ते में ही अपने काफिले के साथ फुरात नदी के किनारे तम्बू लगाकर ठहर गए। लेकिन यजीदी फौज ने इमाम हुसैन के तम्बुओं को फुरात नदी के किनारे से हटाने का आदेश दिया और उन्हें नदी से पानी लेने की इजाजत तक नहीं दी।

इमाम हुसैन जंग का इरादा नहीं रखते थे क्योंकि उनके काफिले में केवल 72 लोग शामिल थे। जिसमें छह माह का बेटा उनकी बहन.बेटियां, पत्नी और छोटे.छोटे बच्चे शामिल थे। यह तारीख एक मोहरर्म थी और गर्मी का वक्त था। गौरतलब हो कि आज भी इराक में ;मई गर्मियों में दिन के वक्त सामान्य तापमान 50 डिग्री से ज्यादा होता है। सात मोहर्रम तक इमाम हुसैन के पास जितना खाना और खासकर पानी था वह खत्म हो चुका था।

इमाम हुसैन सब्र से काम लेते हुए जंग को टालते रहे। 7 से 10 मुहर्रम तक इमाम हुसैन उनके परिवार के मेंबर और अनुनायी भूखे प्यासे रहे।

10 मुहर्रम को इमाम हुसैन की तरफ से एक.एक करके गए हुए शख्स ने यजीद की फौज से जंग की। जब इमाम हुसैन के सारे साथी मारे जा चुके थे तब असर दोपहर की नमाज के बाद इमाम हुसैन खुद गए और वह भी मारे गए। इस जंग में इमाम हुसैन का एक बेटे जैनुलआबेदीन जिंदा बचे क्योंकि 10 मोहर्रम को वह बीमार थे और बाद में उन्हीं से हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पीढ़ी चली।

इसी कुरबानी की याद में मोहर्रम मनाया जाता है। करबला का यह वाकया इस्लाम की हिफाजत के लिए हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के घराने की तरफ से दी गई कुर्बानी है। इमाम हुसैन और उनके पुरुष साथियों व परिजनों को कत्ल करने के बाद यजीद ने हजरत इमाम हुसैन के परिवार की औरतों को गिरफ्तार करने का हुक्म दिया।
यजीद ने खुद को विजेता बताते हुए हुसैन के लुटे हुए काफिले को देखने वालों को यह बताया कि यह हश्र उन लोगों का किया गया है जो यजीद के शासन के खिलाफ गए। यजीद ने हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के घर की औरतों पर बेइंतहा जुल्म किए। उन्हें कैदखाने में रखा जहां इमाम हुसैन की मासूम बच्ची सकीना की सीरिया कैदखाने में ही मौत हो गई।
बहरहाल इस वाकये को 1400 से ज्यादा साल बीत चुके हैं। कत्ल.ए.हुसैन अस्ल में मर्ग.ए.यजीद है। इस्लाम जिंदा होता है हर करबला के बाद।

आरिफ नियाज़ी

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