क्या पूरी तरह से स्वतंत्र है मीडिया ? —– आज मीडिया का एक बडा तबका सरकार की हां में हां मिला रहा हैं या फिर ऐसा करने को वो मजबूर हैं।

क्या पूरी तरह से स्वतंत्र है मीडिया ? —– आज मीडिया का एक बडा तबका सरकार की हां में हां मिला रहा हैं या फिर ऐसा करने को वो मजबूर हैं।

शिबली रामपुरी

कांगे्रस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक संवाददाता सम्मेलन में पत्रकारों से पूछा कि क्या वो मौजूदा समय में स्वतंत्र महसूस कर रहे हैं और क्या वो किसी तरह का कोई दबाव तो महसूस नही कर रहे हैं। राहुल गांधी एक राजनीतिक पार्टी कांगे्रस के अध्यक्ष हैं और वर्तमान में वो विपक्ष मेें भी हैं तो जाहिर सी बात हैं कि राजनीतिक नेता एक दूसरे के खिलाफ बयानबाजी करते रहते हैं। लेकिन जहां तक राहुल का पत्रकारों से ये कहना कि क्या वो खुद को स्वतंत्र महसूस करते हैं और उनको सत्य लिखने में किसी तरह का दबाव तो महसूस नही होता हैं। यदि राहुल के इस सवाल पर गंभीरता से ध्यान दिया जाए और मौजूदा समय में मीडिया के काम करने के तरीके और किरदार की बात की जाए तो क्या हम ये महसूस नही करते हैं कि आज मीडिया का एक बडा तबका सरकार की हां में हां मिला रहा हैं या फिर ऐसा करने को वो मजबूर हैं। जो कोई पत्रकार ऐसा नही करता हैं और जनता के मन की बात को सरकार से करना चाहता हैं और बताता हैं कि कहां पर क्या चूक हो रही है तो उसे अपनी नौकरी से ही हाथ धोना तक पड जाता हैं। कुछ समय में ऐसे कई पत्रकारों की नौकरी गई हैं कि जिन्होंने सरकार की नीतियों की आलोचना की थी और जनता की समस्याओं को बेहतर और मजबूत तरीके से सरकार तक पहुंचाने का प्रयास किया था तो उन पत्रकारों को चैनलों से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। जबकि मीडिया का आज एक ऐसा तबका भी खूब चलन में आ चुका हैं कि जो सुबह से शाम तक सरकार की नीतियों को बढा चढाकर पेश करता है और यहां तक कि एक पार्टी के हक मेें चुनावी माहौल भी तैयार करता हैं। ये वो मीडिया हैं कि जो हर रोज शाम को ऐसे ऐसे मामलोे पर डिबेट कराता हैं कि जिनसे देश और देश की जनता का कोई भला नही हो सकता हैं। एक तरफ एक समुदाय और दूसरी ओर दूसरे समुदाय के कुछ लोगों को बैठा लिया जाता हैं या फोन पर जोड लिया जाता हैं कि फिर उनसे तलाक, हलाला, मदरसों की तालीम जैसे मुददों पर बहस कराई जाती हैं और ये कहना गलत नही होगा कि कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाला एक एंकर भी एकतरफा नजरिये के तहत अपनी राय रखने लगता हैं। जिसे देखकर एक अमन पसंद इंसान यही सोचने लगता हैं आखिर ये सब क्या हो रहा हैं। ये कौन सी पत्रकारिता हो रही हैं। भारत दुनिया का सबसे बडा लोकतांत्रिक देश हैं और लोकतंत्र में मीडिया का अहम रोल होता हैं। यदि मीडिया पूरी तरह से स्वतंत्र नही होगा तो क्या लोकतंत्र पूरी तरह से मजबूत रह सकता हैं। लोकतंत्र को मजबूत रखने के लिए इसके चैथे स्तंभ को भी आजाद और स्वतंत्र रखना बेहद आवश्यक हैं। मीडिया को अपना कार्य पूरी इंमानदारी से करने की जरूरत हैं। मीडिया का कार्य जहां सरकार की नीतियों को जनता के सामने रखना होता हैं वहीं जनता की समस्याओं से भी सरकार बाखबर रहे इस बात की जिम्मेंदारी भी मीडिया पर होती हैं। आज जो मीडिया जनता की समस्याओं को दरकिनार करने पर आमादा है उसे उस दौर को भी याद रखने की आवश्यकता हैं कि जिसमें मीडिया ने अपनी बेबाक तहरीरों से अंगे्रजों की जडें तक हिला कर रख दी थी और फिर अंगे्रजो को भारत छोडकर भागने को मजबूर होना पडा था। क्या आज का मीडिया उसी जज्बें से काम नही कर सकता हैं। आज मीडिया को इस बात पर भी गौर करने की जरूरत हैं कि जनता का भरोसा आज की मीडिया पर कितना कायम हैं कहीं राजनीति की तरह ही देश की एक बडी आबादी का भरोसा तो किसी नही किसी तरह से मीडिया से ंटूट या कमजोर तो नही होता जा रहा हैं।

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