तलाक पर अध्यादेश मुस्लिम महिलाओं से हमदर्दी या सियासत—- ट्रिपल तलाक के मुददे पर शिबली रामपुरी का तफसीली मज़मून

तलाक पर अध्यादेश मुस्लिम महिलाओं से हमदर्दी या सियासत—- ट्रिपल तलाक के मुददे पर शिबली रामपुरी का तफसीली मज़मून

शिबली रामपुरी
मोदी सरकार की ओर से तीन तलाक पर जिस अध्यादेश को मंजूरी दी गई है। उसे सरकार की ओर से जहां मुस्लिम महिलाओं के हक में बताया जा रहा हैं। वही कांगे्रस ने जहां इसे राजनीति करार दिया है। वहीं देवबंदी उलेमा का भी कहना हैं कि ये अध्यादेश किसी भी तरह से मुस्लिम महिलाओं की सुरक्षा नही करता हैं। पिछले साल जब देश की सबसे बडी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को गैर कानूनी करार दे दिया था तब अदालत के फैसले को मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने काफी हद तक सही बताया था क्योकि इस्लाम में एक ही बार में तीन तलाक देने को सही नही कहा गया है। मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने खुद एक ही बार मेे तीन तलाक देने वालों का सामाजिक बायकाट करने तक का ऐलान अदालत के फेसले से पहले किया था। अदालत के फैसले के बाद भी मोदी सरकार तीन तलाक पर एक बिल ले आई जो उसने लोकसभा में तो पास कर दिया लेकिन वो राज्यसभा में अटक गया।अब उसी पर अध्यादेश को मंजूरी दी गई हैं। यहां सवाल ये है कि मोदी सरकार ने इस मामले में देश की उन लाखों महिलाओं को नजरअंदाज कर दिया कि जिन्होंने सडकों पर उतरकर इस बिल का विरोध किया था और इस बिल को महिलाओं के किसी भी तरह से हक में नही बताया था। सरकार को उन महिलाओं की आवाज को भी अहमियत देनी चाहिए थी। वैसे तो अदालत ने जब तीन तलाक को पूरी तरह से गैर कानूनी करार दे दिया था तो फिर इस पर किसी भी तरह के बिल की कोई आवश्यकता ही नही थी। लेकिन सरकार का कहना हैं कि अदालत के फैसले के बाद भी तलाक के मामले सामने आ रहे हैं। ऐसा नही है कि एक ही बार में तीन तलाक के मामलों में महिलाओं पर अत्याचार नही हुए हैं। ये हकीकत हैं कि कई मामलों मे एक ही बार मे तीन तलाक देकर महिला का जीवन बर्बाद कर दिया गया उन बातोें पर तलाक दे दिया गया कि जिन पर नही दिया जाना चाहिए था लेकिन ये भी गंभीरता से सोचने की बात है कि ये मुस्लिम समाज का एक पर्सनल और धार्मिक मामला है इसमें समाज की ओर से ही सुधार की पहल होनी चाहिए थी तब शायद ऐसी नौबत ही नही आती जहां तक मुस्लिम समाज की बात है तो आजादी के बाद से देश के मुसलमानों की राजनीतिक हालत धीरे धीरे कमजोर ही होती रही हैं। पहले मुसलमानों के बारे में एक गलतफहमी ये फैली हुई थी कि मुस्लिम वोट बैंक है और जिसकी झोली में ये वोट बैंक चला जायेगा वही चुनाव में कामयाब होगा और इस वोट बैंक के बिना राजनीति मेे कोई भी राजनीतिक दल कामयाब नही हो सकता है। इसी के चलते नेताओं की एक बडी संख्या हर उस जगह जाती थी कि जहां से मुसलमानोें मे ये पैगाम जाए कि वो मुसलमानोे के हमदर्द हैं। कुछ नेता राजनीति मेें दिलचस्पी रखने वाले उलेमा के दरबार में भी हाजरी लगाया करते थे तो कुछ किसी और तरीके से मुसलमानों को अपने हक मेें करने का प्रयास करते थे। लेकिन साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने शानदार तरीके से कामयाबी हासिल करके और देश के सबसे बडे राज्य यूपी से एक भी मुसलमान के लोकसभा जाने में कामयाब ना होने से ये गलतफहमी या भरम पूरी तरह से टूट गया कि मुस्लिम वोट बैंक हैं। इसके बाद यूपी के विधानसभा चुनाव मेे भाजपा ने एक भी मुस्लिम को टिकट ना देकर भी शानदार सफलता हासिल करके तो इस गलतफहमी को पूरी तरह ही दूर कर दिया कि मुस्लिम वोट बैंक भी कुछ होता हैं। दरअसल खुद को सेक्युलर कहने वाली कुछ राजनीतिक पार्टीयों ने मुसलमानों के बारें मे ये गलतफहमी फैला रखी थी कि मुस्लिम वोट बैक होता है और उसको बहकाकर या तरक्की और खुशहाली के ख्वाब दिखाकर अपना सियासी मकसद पूरा किया जा सकता है। ये तो हकीकत है और आजादी के बाद से आज तक मुसलमानों के साथ ये होता भी रहा है कि मुसलमानों को तरक्की और खुशहाली के ख्वाब चुनाव के समय दिखाकर राजनीतिक पार्टीयों की ओर से अपना राजनीतिक मकसद पूरा किया जाने का प्रयास पूरे जोशो खरोश से किया जाता रहा और चुनाव मेें कामयाब होने के बाद मुसलमानो को नजरअंदाज कर दिया जाता। लेकिन अल्पसंख्यक वर्ग खास तौर पर मुसलमान कभी वोट बैंक नही रहे। ये अलग बात हैं कि मुसलमान हमेशा सियासत के केन्द्र में रहे हैं और शायद ये सिलसिला कभी थमेंगा भी नही क्योकि ये एक कडवी हकीकत हैं कि हर चुनाव का आगाज सडके,पानी,बिजली जैसी समस्याओं से जरूर होता हैं मगर अफसोस वोट डालने के समय तक चुनाव पर मजहबी रंग चढ जाता है। जिसके कारण कई बार ऐसा व्यक्ति चुनाव जीत जाता हैं कि फिर पांच साल तक जनता को पछताने के अलावा कुछ और हाथ नही लगता है। चुनाव के दौरान कोई राजनीतिक दल मुस्लिम विरोध मेें वोट पाने का प्रयास करता हैं तो ज्यादातर राजनीतिक दल खुद को मुसलमानोें का हमदर्द साबित करने का प्रयास कर मुसलमानों पर डोरे डाले जाते हैं। जिस तरह के सियासी हालात या बदहाली के दौर से मुस्लिम गुजर रहे हैं उसे देखकर आसानी से ये अहसास होता हैं कि मुस्लिम समाज एक बेहतर राजनीतिक नेतृत्व चाहता है।मुस्लिम समाज शिक्षा से लेकर रोजगार और राजनीतिक तौर पर मजबूती हासिल करना चाहता है। लेकिन मुस्लिमों में ही ऐसे लोगों की कमी नही हैं कि जो मुसलमानों को बदहाल ही रहने देना चाहते हैं। ऐसे लोग चुनाव के समय तो काफी संख्या में आ जाते हैं और कभी इस पार्टी तो कभी उस पार्टी को वोट देने का बात करते हैं। जिससे एक तरह से मुसलमान गुमराह हो जाते हैं। यदि ऐसा नही होता तो मुसलमान राजनीतिक तौर पर इतने कमजोर नही होते। आज मुसलमानों को सोचना होगा कि कैसे वो राजनीतिक तौर पर मजबूती हासिल कर सकते हैं। जब तक मुसलमान शिक्षा और राजनीतिक तौर पर कमजोर रहेेगा तो वो हर तरह की बदहाली के दौर से गुजरते रहेंगे। केन्द्र सरकार को चाहिए कि वो सिर्फ तलाक को ही मुस्लिमों की बदहाली के लिए जिम्मेदार ना ठहराए बल्कि कुछ और समस्याओं की ओर भी ध्यान दे जैसे मुस्लिमों में आज भी शिक्षा हासिल करने का प्रतिशत काफी कम है तो मुसलमानों के लिए सच्चर कमेटी की रिपोर्ट पर अमल करते हुए मुसलमानों के लिए बेहतर और आसान शिक्षा की व्यवस्था करे।

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