दुनियावी तौर पर कामयाबी के लिए मुसलमानों को अंगे्रजी की शिक्षा भी हासिल करने की जरूरत—– शिबली रामपुरी का खास लेख

दुनियावी तौर पर कामयाबी के लिए मुसलमानों को अंगे्रजी की शिक्षा भी हासिल करने की जरूरत—– शिबली रामपुरी का खास लेख

शिबली रामपुरी
मौजूदा दौर में हम इस बात पर कुछ गर्व अवश्य कर सकते हैं  कि मुसलमानों में शिक्षा के प्रति रूझान में कुछ इजाफा हुआ हैं और मुस्लिम तालीम के मैदान में आगे बढ रहे हैं। लेकिन हम ये सोचकर हाथ पर हाथ रखकर नही बैठ सकते हैं कि आज मुसलमान शिक्षा की ओर बढ रहे हैं तो फिर अब हमको कुछ करने की जरूरत नही हैं। आज के दौर में मुसलमानों को शिक्षा के मामलें में काफी आगे ले जाने के लिए जदोजहद करने की काफी जरूरत हैं। जिस तरह से कभी अलीगढ मुस्लिम विश्वविधालय के संस्थापक सर सैयद अहमद खां ने मुसलमानों को तालीम की तरफ ले जाने के लिए कठिन मेहनत की थी आज उसी जज्बे की मुसलमानों को फिर से आवश्यकता हैं। हालांकि आज मुसलमानों के सामने उस दौर जैसे कठिन हालात तो नही हैं मगर फिर भी ये एक कडवी हकीकत हैं कि मुसलमानों को आजादी के बाद से लेकर आज तक शिक्षा से लेकर रोजगार और राजनीतिक रूप से बदहाली का सामना करने को मजबूर होना पड रहा हैं। जब सर सैयद ने उस दौर में ये बात महसूस की कि यदि मुसलमानों को अंगे्रजों से मुकाबला करना हैं तो उनको दीनी तालीम के साथ साथ अंगे्रजी भी हासिल करने की सख्त जरूरत हैं। हालांकि जब सर सैयद ने ये बात कही तो उनको उस वक्त काफी दिक्कतों को सामना उनके समाज की ओर से सबसे अधिक करना पडा था। सर सैयद ने अंगे्रजो का मुकाबला करने के लिए शिक्षा का रास्ता चुनना ज्यादा बेहतर समझा और मुसलमानों से अपील की कि यदि अंगे्रजो से मुकाबला करना हैं और अपना मकाम बनाना हैं तो मुसलमानों को अंगे्रजी पर फोकस करना होगा। ये हकीकत भी हैं कि इस्लाम का पैगाम हैं कि जितनी भी हो सके शिक्षा हासिल करो और इसके लिए चाहे विदेश ही क्यूं ना जाना पडे। इस्लाम में शिक्षा को बहुत अहमियत हासिल हैं। ऐसे मेें इस्लाम के इस पैगाम को समझने खास तौर पर आज के दौर मेे समझने की तो बेहद जरूरत हैं।आज फिर मुसलमानों को दीनी तालीम के साथ अंगे्रजी पर फोकस करने की अत्यंत जरूरत हैं। क्योकि आज अंगे्रजी जबान दुनियावी तौर पर कामयाबी का एक ऐसा रास्ता बन चुकी हैं कि जिसके माध्यम से इंसान सफलता के नये आयाम स्थापित कर सकता हैं। लेकिन ये भी एक कडवी हकीकत हैं कि इस मामलें में मुसलमाना काफी पीछे हैं और वो इस बदहाली से कैसे निजात हासिल कर सकते हैं। यदि इस पर गंभीरता से ध्यान दिया जाए और इसको दूर करने के उपाय के बारें मे सोचा जाए तो इसके लिए काफी कुछ करने की जरूरत हैं। सबसे पहले हमको ये समझना होगा कि मुसलमानों में एक बडी आबादी ऐसी हैं जिसके बचपन के कई साल मदरसों में तालीम हासिल करने मेे गुजरते हैं। जो किसी तरह से गलत नही हैं। क्योकि दीनी तालीम का जानना भी जरूरी हैं। लेकिन कितना बेहतर हो कि इन मदरसों में बच्चों को अंगे्रजी की तालीम भी दी जाए तो फिर जब तक वो स्कूल कालेज का रूख करेंगे तो फिर उनको किसी तरह की कोई परेशानी पेश नही आयेंगी। हालांकि आज के वक्त में ऐसे मदरसों की भी कमी नही हैं कि जो अपने यहां दीनी तालीम के साथ हिन्दी और अंगे्रजी की शिक्षा भी देते हैं। यहां तक कि जो बच्चे कंप्यूटर की शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं तो वो कर सकते हैं। इन मदरसों ने दरअसल इस्लाम के जहां उस पैगाम को गंभीरता से समझा कि जिसमें तालीम को बहुत अहमियत दी गई हैं तो वहीं दुनिया में मुसलमानों के आधुनिक शिक्षा के पिछडेपन को भी महसूस किया और अपने यहां दुनियावी तालीम को अहमियत देनी आरंभ कर दी। लेकिन ये भी हकीकत हैं कि आज भी ऐसे मदरसों की कोई कमी नही खास तौर गांव देहातों के मदरसों में जहां पर सिर्फ दीनी तालीम ही बच्चों को दी जाती हैं। जबकि वहां होने वाले सालाना इजलास मेें मुस्लिम विद्वान मुसलमानों से पूरे जोशो खरोश से दीनी तालीम के साथ दुनियावी तालीम भी अपने बच्चों को दिलाने की अपील करते हैं। जब ऐसा नजरिया हमारे उलेमा का होता हैं तो फिर मदरसों में क्यूं अंगे्रजी की तालीम नही दी जाती हैं। आज मुसलमान अंगे्रजी के मामलेे मे बदहाली के दौर से गुजर रहे हैं और अंगे्रजी की शिक्षा बेहद जरूरी हो गई हैं। जिन बच्चों पर या युवाओं पर अंगे्रजी नही आती है वो काफी कमजोर समझे जाते हैं। इसलिए वक्त की सबसे बडी जरूरत ये हैं कि मुसलमानों को दीनी तालीम के साथ हिन्दी और अंगे्रजी की शिक्षा भी हासिल करनी चाहिए।

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