धार्मिक आधार पर ये भेदभाव क्यूं— शिबली रामपुरी का फिक्र अंगेज़ मज़मून

धार्मिक आधार पर ये भेदभाव क्यूं— शिबली रामपुरी का फिक्र अंगेज़ मज़मून

शिबली रामपुरी
मुंबई से प्रकाशित एक मशहूर उर्दू समाचार पत्र की रिपोर्ट के मुताबिक मुंबई में कई ऐसे इलाके हैं कि जहां पर मुसलमानों को किराये पर दुकान,मकान नही दिया जाता हैं और साफ कह दिया जाता हैं कि आपको इसलिए दुकान या मकान नही दिया जा सकता क्योकि आप मुसलमान हैं। मुंबई में वैसे ऐसा होना कोई नयी बात तो नही हैं। क्योकि कई बार वहां पर ऐसे मामले सामने आ चुके हैं कि जिनमें किसी को नौकरी देने से या मकान देने से सिर्फ उसके मुसलमान होने की वजह से इंकार कर दिया गया।इसमें खास बात ये भी हैं जो गंभीरता से गौर करने लायक हैं कि ऐसा किसी अनजान या मामूली हैसियत रखने वाले किसी मुसलमान के साथ ही नही हुआ बल्कि उन लोगों को भी इस तरह की परेशानियों का सामना करने को मजबूर होना पडा कि जिनको पूरा देष जानता हैं। कई मशहूर मुस्लिम फिल्मी कलाकारों को मुस्लिम होने की वजह से फलेट,मकान देने से इंकार कर दिया गया और वो मामले मीडिया की सुर्खियों में भी रहे।जो लोग मुसलमानो को कालोनियों मे या बस्तियों मे दुकान मकान देने से मना कर देते हैं उनकी अधिकतर ये दलील होती हैं कि ऐसा वो धर्म की बुनियाद पर नही करते बल्कि मुसलमानों के रहन सहन और खास तौर पर उनके खाने पीने के तौर तरीकों की वजह से करते हैं। क्योकि मुसलमानों के मांसाहार खाने की वजह से दूसरे समुदाय के लोगों को काफी परेशानी उठानी पडती हैं। ऐसी दलील देने वालों को बातों में कितना दम हैं यदि इसकी पडताल करें तो जो दलील वो देते हैं वो पूरी तरह से सही नही मानी जा सकती हैं। क्योकि मुसलमानों के रहन सहन से कभी किसी को कोई परेशानी नही हुई और जहां तक मुसलमानों के मांसाहार खाने की बात हैं तो ये भी सोचने की बात हैं कि क्या आज के समय में सिर्फ मुसलमान ही मांसाहारी होते हैं। दूसरी बात ये हैं कि यदि किसी सोसायटी कालोनी का नियम षाकाहार हैं तो फिर जो भी इन नियमों को तोडे तो उसके खिलाफ कारवाई की जानी चाहिए इसमें मकान खाली कराना भी हो सकता हैं।लेकिन किसी मुस्लिम से ये कह देना कि तुमको तो मकान या दुकान मिलेगी ही नही ये किसी तरह से भी बेहतर नही माना जा सकता हैं। दूसरी ओर भारत एक काबिले तारीफ लोकतांत्रिक देश हैं जहां पर सबको बराबर हक हासिल हैं।कोई भी किसी के लोकतांत्रिक अधिकार से उसे वंचित नही कर सकता हैं। लेकिन अफसोस की बात हैं कि देश में ऐसा हो रहा हैं और इस तरह के मामलों में बढोत्तरी हो रही हैं। मुंबई के अलावा देश में ऐसी कई जगह हैं कि जहां पर मुसलमानों को दुकान मकान खरीदना तो दूर उनको किराये तक पर नही दिया जाता हैं। यूपी की ही बात करें तो यहां पर कई जिलोें में ऐसी कई जगहें हैं कि जहां पर मुसलमानों को दुकान और मकान ना तो किराये पर दिया जाता हैं और ना ही वो वहां पर दुकान मकान को खरीद सकते हैं। यहां तक कि कई कस्बों में हमको ऐसी ऐसी कालोनियां नजर आती हैं कि जहां पर मुसलमानों को मकान नही दिया जाता हैं। यहां ये कहना भी मकसद नही हैं कि जो लोग मुसलमानों को अपनी कालोनियों मे मकान नही देते या फिर उनको दुकान नही दी जाती तो वो ही कसूरवार हैं बल्कि अगर कहीं पर मुसलमान भी गैर मुस्लिम भाईयों के साथ ये सलूक करते हैं कि उनको अपने क्षेत्रों में दुकान या मकान नही दिया जाता हैं तो वो भी गलत करते हैं। भारत जैसे दुनिया के सबसे बडे लोकतांत्रिक देश में मजहब की बुनियाद पर किसी को उसके अधिकारों से वंचित नही किया जा सकता हैं। भारत की यही तो सबसे बडी खूबसूरती हैं कि यहां पर सभी धर्मों के लोग एक साथ मिलजुलकर रहते आए हैं। हमे उम्मीद हैं कि भारत में अमनो अमान और आपसी भाईचारे का ये सिलसिला हमेशा इसी तरह से कायम रहेगा। जहां तक मजहब की बुनियाद पर किसी को उसके संवेधानिक अधिकारों से वंचित किए जाने का सवाल हैं तो उस पर सरकार को गंभीरता से सोचने की जरूरत हैं कि देश में फिरकापरस्ती की वजह से क्यूं किसी को उसके अधिकारों से महरूम करने का कुछ लोग प्रयास कर रहे हैं।

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