निर्दोष दो पत्रकारों को सज़ा–इन दोनो पत्रकारों का कसूर यह है कि उन्होने अपना फर्ज निभाते हुए बर्मा की सेना की करतूतों को दुनिया के सामने लाने की कोशिश की है।

निर्दोष दो पत्रकारों को सज़ा–इन दोनो पत्रकारों का कसूर यह है कि उन्होने अपना फर्ज निभाते हुए बर्मा की सेना की करतूतों को दुनिया के सामने लाने की कोशिश की है।

बर्मा में रोहिग्याई मुस्लिमानों के कत्ले आम को मंज़रेआम पर लाने वाले दो पत्रकारों को साथ साथ वर्ष की सज़ा दी गई है। इस सज़ा का विश्वभर के पत्रकारों ने विरोध किया है। दोनो पत्रकार बर्मा के नागरिक है जो अंग्रेज़ी समाचार एजेन्सी ‘रायटर’ के लिए काम करते है।
इस सारे मामले में आंग सान सू की का व्यवहार खेदजनक है। ‘‘आंग सान सू की’’ का ऐसा ही रोहिग्याई मुसलमानों पर हुए ज़ल्म-औ-सित्म पर भी था। यह वे ही आंग सान सू की है जिन्हें इन्साफ के लिए लडने के लिए नोबिल पुरस्कार मिला हुआ है। लेकिन सत्ता में आते ही आंग सान सू की का नज़ारिया बदल गया। उनको बर्मा में सेना द्वारा किये गये जुल्म नजर नही आ रहे है। आंग सान सू की का कहना है कि रोहिग्याई मुसलमानों के साथ कुछ नही हुआ है और सेना ने कोई ज़्यादती नही की है।
आंग सान सू की ये भी भूल चूकी हैं कि जब वह बर्मा की इसी सेना कि कैद में थी तो विश्वभर के अमन पसंद लोगों और पत्रकारों ने बिना किसी धर्म व नस्ल के भेदभाव के उनका साथ दिया था और इन्साफ के लिए लडने के लिए उनको नौबिल पुरस्कार भी दिया गया था। लेकिन आज उन्ही आंग सान सू की के राज में लाखों मासूम रोहिग्याई मुसलमान व बेकसूर पत्रकार इन्साफ के तरस रहे। इन दोनो पत्रकारों का कसूर यह है कि उन्होने अपना फर्ज निभाते हुए बर्मा की सेना की करतूतों को दुनिया के सामने लाने की कोशिश की है।
ये पत्रकार रखाइन राज्य के इन डिन गांव में 10 रोहिंग्याओं की एक विशाल कब्र की जांच कर रहे थे। जिसके लिए म्यांमार सेना के सात सैनिकों को दोषी ठहराया गया और जिन्हें 10 साल जेल की सजा सुनाई गई है।

बर्मा की सेना की गैर.इन्सानी हरकतों की पुष्टि संयुक्त राष्ट्र संघ भी कर चुका है। और संयुक्त राष्ट्र संघ ने बर्मा के सेना प्रमुख सहित रोहिग्याई मुस्लिमानों पर हत्याचार में शामिल अन्य सैनिकों पर अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय में मुकदमा चलाने की सिफारिश की है। दरअसल बर्मा सरकार अपने सैनिकों को बचाने के लिए निर्दोष पत्रकारों को बलि का बकरा बना रही है।
अब देखना यह भी है कि अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय बर्मा के मानवता के अपराधी बर्मा के सैनिकों को क्या सज़ा देता है पर इस समय ज़रुरत है कि भारत सहित सभी देशों व इन्साफ पसन्द लोगों को बर्मा सरकार पर दबाव डालना चाहिए की दोषी सैनिकों को सख्त सज़ा देने के साथ साथ निर्दोष दोनो पत्रकारों को जिन्होंने अपनी जान की बाज़ी लगा कर अपना फर्ज़ अदा किया है तुरन्त रिहा किया जाये।

डा0 जमशैद उस्मानी
प्रधान सम्पादक
गोल्डन टाइम्स

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