प्रधानमंत्री का मस्जिद में जाने का मकसद और पैगाम

प्रधानमंत्री का मस्जिद में जाने का मकसद और पैगाम

शिबली रामपुरी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वैसे तो विदेशों में कई मस्जिदों में जा चुके हैं। लेकिन जहां तक भारत की बात है तो वो पहली बार इंदौर की दाउदी बोहरा समुदाय की मस्जिद में गए और जिस तरह से वहां पर उन्होंने अपने ख्यालातों का इजहार किया और बोहरा समुदाय के सामाजिक और धार्मिक कार्यो की प्रशंसा की उसने हर किसी को एक तरह से हैरत में डाल दिया। क्योकि मोदी अपने चार साल से ज्यादा के प्रधानमंत्री पद के कार्यकाल में भारत की किसी मस्जिद में अब तक नही पहंुचे थे हालांकि कई बार उनके बारें मे भारत की देहली की जामा मस्जिद में जाने जैसी कुछ चर्चाएं भी कभी कभी सुनने को मिलती रही। कुछ जगहों पर हुए कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री ने मुस्लिम टोपी तक पहनने से इंकार कर दिया जिसके बाद कुछ लोगों ने इस बात पर ऐतराज भी किया कि मोदी को मुस्लिम धर्मगुरूओं की ओर से कार्यक्रम में पेश की गई टोपी को पहनना चाहिए था हालांकि यहां बडा सवाल ये भी हैं कि जिन नेताओं ने मुस्लिम टोपी पहनकर मुसलमानों के कार्यक्रमों में शिरकत की वो मुसलमानों का कितना भला कर सके।टोपी पहनकर मुसलमानों को सिर्फ लुभाने का ही प्रयास किया गया।यदि ऐसा नही होता तो फिर मुसलमान आजादी के इतने समय बाद भी इस तरह से बदहाली का सामना करने को मजबूर नही होते। जहां तक प्रधानमंत्री मोदी की मस्जिद में जाने की बात हैं तो उससे एक बात जरूर महसूस की जा सकती हैं कि भाजपा अब दलितों के साथ मुसलमानों पर भी डोरे डालने का प्रयास कर रही है और इसी राजनीतिक नजरिये के चलते मोदी इंदौर में बोहरा मुसलमानों की मस्जिद में गए। दरअसल बीते लोकसभा चुनाव और उसके बाद कुछ राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी दलित समाज का रूझान भाजपा की ओर रहा था और दलितों के वोटों ने भाजपा की राजनीतिक नैया पार लगाने में अहम रोल निभाया था। लेकिन यदि हम मौजूदा समय का बात करें तो भाजपा के सामने इस समय दो चुनौतियां हैं जिनमें एक तो भाजपा से नाराज चल रहे दलितों को फिर से अपने हक में करना और दूसरा भाजपा सरकार में सहयोगी पार्टीयों का भरोसा बनाए रखना हैं। कुछ दिन पहले भाजपा अध्यक्ष अमित शाह सहयोगी पार्टीयों के नेताओं से मुलाकात करते भी नजर आए थे। जहां तक भाजपा से दलितों की नाराजगी की बात हैं तो जब भाजपा सत्ता में आई थी तब दलितों को उम्मीद थी कि भाजपा सरकार उनके विकास के लिए भी कार्य करेंगी लेकिन कुछ जगहों पर दलितों के साथ हुए अत्याचार के मामलों ने दलितों का काफी हद तक भाजपा से मोहभंग करने का काम कर दिया और दलित उससे दूरी बनाते चले गए।भाजपा से दलितों की दूरी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता हैं कि दलितों में कई ऐसे युवा नेता उभरकर सामने आए कि उन्होंने भाजपा के खिलाफ आवाज बुलंद करनी आरंभ कर दी और इसमें दलित समाज के काफी लोग उनकी हिमायत में भी उतर आए। ऐसे समय में भाजपा को मुसलमानों पर भी डोरे डालने को मजबूर होना पड रहा हैं। लेकिन सवाल ये हैं कि भाजपा की केन्द्र सरकार को चार साल से अधिक समय गुजर चुका हैं। ऐसे में भाजपा सरकार ने मुसलमानों के लिए क्या विकास किया। लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री ने एक मशहूर टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा था कि वो मुस्लिम युवाओं के एक हाथ मेें कुरआन तो दूसरे हाथ में कंप्यूटर देखना चाहते हैं। प्रधानमंत्री ने सबका साथ सबका विकास जैसा काबिले तारीफ नारा भी दिया था जिसके बाद मुसलमानों में भी ये उम्मीद जगी थी कि भाजपा सरकार मुसलमानों की तरक्की और खुशहाली के लिए भी काफी कुछ करेंगी लेकिन क्या ऐसा कुछ अभी तक हो सका हैं। अब प्रधानमंत्री की तरफ से मुसलमानों की लुभाने का जो इशारा मिल रहा हैं। वो बताता हैं कि भाजपा आगामी लोकसभा चुनाव और उससे पहले कुछ राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों मेें मुस्लिम वोट के सहारे कामयाबी हासिल करना चाहती हैं। दरअसल यहां ये कहना भी गलत नही होगा कि यदि प्रधानमंत्री मुसलमानों के साथ जरूरत से ज्यादा नरम रवैंया रखते हैं तो इससे आरएसएस नाराज हो सकता हैं। क्योकि संघ का जो नजरिया मुसलमानों के संबंध में रहा हैं वो किसी तरह से छिपा नही हैं।

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