बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर के परिनिर्वाण दिवस पर पत्रकार दीपक मौर्य का विशेष आलेख- बाबा साहेब के विचारों की नहीं केवल राजनीति के लिए उनके नाम की जरूरत

बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर के परिनिर्वाण दिवस पर पत्रकार दीपक मौर्य का विशेष आलेख- बाबा साहेब के विचारों की नहीं केवल राजनीति के लिए उनके नाम की जरूरत

 देश के 90 प्रतिशत लोग तथा 100 प्रतिशत राजनैतिक दल बाबा साहेब का परिनिर्वाण दिवस मना रहें है पर क्या वो वास्तव में ही सच्चे दिल से उन्हें याद कर रहे हैं नहीं बिल्कुल नही। अगर इसका विश्लेषण करें तो यही निकल कर आता है कि राजनैतिक दल तो केवल उनके नाम का इस्तेमाल वोटों में करने के लिये उनका परिनिर्वाण दिवस मना रहे हैं। इसमे अपने आप को सबसे बड़े अम्बेडकरवादी दल का राग अलापने वाली बसपा भी शामिल है। राजनैतिक दलों का विश्लेषण करें तो डॉ अम्बेडकर ने कांग्रेस को अपने जीते जी ही मंत्रिमंडल से इस्तीफा देकर अपना विरोध जता दिया था। उन्होंने उस वक्त ही अपने समाज और अपने अनुयायियों से कांग्रेस का कभी भी चवन्नी का भी सदस्य न बनने का आग्रह किया था लेकिन तमाम अनुसूचित जाति जन जाति के लोग  मात्र अपने निजी राजनैतिक स्वार्थ के कारण कांग्रेस में उच्च पदों को सुशोभित कर रहे हैं और अपने आपको अम्बेडकरवादी कहते हैं।
भाजपा की बात करें तो केवल मात्र राजनैतिक स्वार्थ के कारण ही बाबा साहब के नाम का राग अलाप रही है। बाबा साहेब तो कभी जनसंघ के विचारों से ही सहमत नही रहे। सबसे ज्यादा छुआछूत और घृणा फैलाने वाले लोग ही भाजपा में हैं।  सपा ने कभी डॉ अम्बेडकर के सपनो के भारत के बारे में सोचा ही नही यही हाल अन्य छोटे क्षेत्रीय दलों का भी है। अब बात करते हैं अपने आप को मिशन और मूवमेंट का नाम देने वाली और सबसे बड़े अम्बेडकर दल के रूप में ख्याति बटोरने वाली बसपा की। तो ये तो सच है कि बाबा साहेब को देश और विश्व व्यापी पहचान दिलाने में बसपा के संस्थापक कांशीराम साहब का महत्वपूर्ण योगदान है। लेकिन ये भी उतना ही कड़वा सच है कि बसपा ने भी राजनैतिक स्वार्थ के वशीभूत ही बाबा साहेब के नाम का केवल इस्तेमाल किया। उनकी विचारधाराओं पर टिकने का साहस बसपा भी नही जुटा सकी। 
जो लोग मिशन और मूवमेंट के बारे में कहते नही थकते उन्हें शायद मिशन और मूवमेंट का म नही पता। बाबा साहेब का सपना या यूं कहें बाबा साहब का मिशन सदियों से जुल्म का शिकार हुए, शोषक वर्ग द्वारा सताये गए, और जन्मों से जातीय उत्पीड़न का दंश झेल रहे, शिक्षा और संपत्ति से बेदखल किये गए और इस देश मे किसी भी प्रतिनिधित्व में कोई अधिकार न रखने वाले एक ऐसे वर्ग के सामाजिक व आर्थिक उत्थान के एजेंडे का था। लेकिन दोनों ही एजेंडे धरातल पर कहीं से भी पूरे होते नही दिख रहें है। केंद्र में भाजपा और कांग्रेस की सरकारें रही हैं लेकिन वंचित समाज आज भी मूल अधिकारों से वंचित ही है। वर्षों  से चली आ रही हिन्दू समाज मे वर्ण व्यवस्था के तहत जो लोग या जो समुदाय सबसे निचले पायदान पर आते हैं उन्हें ही संविधान में एससी, एसटी व ओबीसी कहा गया है। ये सब ही दलित हैं। दलित शब्द का अर्थ है दलन किया हुआ मतलब दबाया हुआ अर्थात जिसका शोषण व उत्पीड़न हुआ हो वह दलित है। आज भी दलितों से अन्य नागरिकों की तरह सामान्य व्यवहार नही होता है।
अगर बाबा साहब के पहले सपने के बारे में बात करें तो उन्होंने समानता का सपना देखा था लेकिन न तो वो उनके जीते जी पूरा हुआ और न ही उनके मरने के बाद। उन्होंने अपने जीते जी 14 अक्टूबर 1956 को जाति व्यवस्था में उलझे हिन्दू धर्म को छोड़कर समानता का संदेश देने वाले बिना जाति वाला बौद्ध धर्म अपना लिया। इससे उन्हें लगा कि कल का 85 प्रतिशत शुद्र वर्ण जिन्हें उन्होंने संविधान में एससी एसटी व ओबीसी का नाम दिया है वो बौद्ध धर्म को अपनाकर, सभी सछूत और अछूत भाई मिलकर अपना साम्राज्य खुद बना लेंगे लेकिन राजनैतिक स्वार्थियो ने इस मिशन को सबसे बड़ा धक्का पहुंचाया। मार्च 1956 में आगरा में दिए भाषण में बाबा साहेब ने भी यह कहा था कि अगर मैने अपने लोगों की भावनाओं को पहले ही समझ लिया होता तो मै बहुत पहले ही बौद्ध धर्म ग्रहण कर लेता। 
भाजपा कांग्रेस व अन्य पार्टियों से तो बौद्ध समर्थक होने की कल्पना भी नही की जा सकती लेकिन डॉ अम्बेडकर के बाद उनके इस सामाजिक मिशन को सबसे बड़ा आघात राजनैतिक स्वार्थ के कारण अपने आपको अम्बेडकरवादी पार्टी कहने वाली बसपा ने पहुंचाया।  मायावती आज तक बौद्ध धर्म के नाम पर धमकी देकर केवल राजनैतिक स्वार्थ को हल कर रहीं है ” कि मै कभी भी अपने समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण कर लूंगी। क्या बौद्ध धर्म जहर है जिसकी धमकी देकर मनुवादियों को डराने की कोशिश की जा सकती है शायद मायावती ने इससे ज्यादा बौद्ध धर्म को कुछ समझा नही है नही तो डॉ आंबेडकर के गहन अध्ययन के बाद बौद्ध धर्म ग्रहण करने के फैसले के बारे में किसी को सोचने की आवश्यकता नही पड़ती।  सवर्णवादी पार्टियों से तो उम्मीद क्या लेकिन जो बहुजन से सर्वजन बन जाये उससे भी भला क्या उम्मीद की जा सकती है। बाबा साहब का समानता का सपना भी राजनीति की भेंट चढ़ गया। 
अब बाबा साहेब के दूसरे सपने के बारे में बात करें तो उन्होंने शुद्र समाज के आर्थिक उत्थान का ताना बाना बना था। सामाजिक उत्थान में राजनैतिक प्लेटफार्म की आवश्यकता नही पड़ती लेकिन आर्थिक उत्थान का खाका बिना राजनैतिक हस्तक्षेप या यूं कहें कि बिना सत्ता के पूरा नही हो सकता है। बाबा साहेब ने पूना पैक्ट में सब कुछ गंवाकर केवल वयस्क मताधिकार और राजनैतिक आरक्षण ही प्राप्त किया था। लेकिन आज एससीएसटी व ओबीसी के सांसद, विधायक को शायद बाबा साहेब का मिशन सपने में भी याद नही आता। ये पूरा शुद्र वर्ण आज राजनौतिक पार्टियों में बटा नजर आता है। और ये मिशन भी राजनीति की भेंट ही चढ़ गया है। 
जब जब चुनाव आते हैं तो जब दलितों के विकास की बात की जाती है तो केवल नाली, खड़ंजे, हैंडपंप, पक्के मकान, और पेंशन की ही बात की जाती है जैसे बस यही दलितों को दरकार है। राजनैतिक दलों द्वारा कभी दलितों की उच्च शिक्षा की बात नही की जाती, बैकलॉग को पूरा करने की बात नही की जाती, उन्हें अडानी और अम्बानी की तरह बड़े बड़े लोन देकर उद्योग चलवाने की बात नही की जाती, अम्बेडकर की तरह प्रतिभावान छात्रों को सरकारी खर्च पर शिक्षा के लिए विदेश भेजने की बात नही की जाती, कभी जातिवार जनगणना कराकर उन्हें उचित प्रतिनिधित्व देने की बात नही की जाती, कभी देश की कृषि भूमि जो बड़े बड़े जमीदारों के पास कब्जे में है बांटकर उन्हें बराबर बाटने की बात नही की जाती, जिस सरकारी वर्ग जैसे सेना के उच्च पदों, न्यायिक सेवा के उच्च पदों पर दलितों का जीरो प्रतिनिधित्व है वहां भेजने की बात नही की जाती, तमाम मठ मंदिरों में दलितों को पुजारी बनाने की बात नही की जाती, ठेकेदारी में दलितों के प्रतिनिधित्व पर बात नही की जाती, और निजी क्षेत्र में दलितों को भी पर्याप्त नौकरी मिले इसके लिये निजी क्षेत्र में आरक्षण की बात नही की जाती।
इसलिये 14 अप्रैल 1891 को जन्मे इस महामानव के परिनिर्वाण 6 दिसम्बर 1956 तक किये गये संघर्ष का वो परिणाम नही मिला जिसके लिए उन्होंने आजीवन प्रयास किया। दलितों की जो थोड़ी बहुत दयनीय स्थिति में सुधार हुआ है वो केवल बाबा साहेब की सामाजिक क्रांति व उनके द्वारा लिखित संविधान में प्रदत्त अधिकारों की वजह से हुआ है। किसी भी राजनैतिक दल ने उनकी मूल विचारधारा को अपनाने का प्रयास नही किया है। केवल स्वार्थवश आज उनके नाम का राजनीतिकरण हो चुका है। सभी राजनैतिक दल केवल दलित वोटों की संख्या बल को महत्व देते हुए डॉ अम्बेडकर को जबरदस्ती ढोने का काम कर रहे हैं।आज उनके परिनिर्वाण दिवस पर अम्बेडकरवादी केवल यही सोच रहे हैं कि काश इस सदी में कोई दूसरा अम्बेडकर पैदा हो जाये जो सबको साथ लेकर चल सके। डॉ अम्बेडकर के नाम पर बने तमाम अराजनैतिक व राजनैतिक संगठनों के लोग आपस मे नही मिलकर बैठ सकते तो वो इस 85 प्रतिशत समाज को क्या खाक जोड़ेंगे। बाबा साहेब को सच्ची श्रद्धांजलि देने की हिम्मत किसी मे नही है।

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