महागठबंधन पर सियासत, आज कांगे्रस के लिए सबसे बडी जिम्मेंदारी आगामी लोकसभा चुनाव में एक मजबूत महागठबंधन तैयार करने की हैं।

महागठबंधन पर सियासत, आज कांगे्रस के लिए सबसे बडी जिम्मेंदारी आगामी लोकसभा चुनाव में एक मजबूत महागठबंधन तैयार करने की हैं।

शिबली रामपुरी

कंाग्रेस की राह आगामी लोकसभा चुनाव से पहले ही कठिन होती नजर आ रही है। जिस तरह से बसपा प्रमुख मायावती ने गठबंधन के नाम पर कांगे्रस के सीनियर नेता दिग्विजय सिंह के बयान के संदर्भ में कांगे्रस के खिलाफ मोर्चा खोला है।उससे तो यही लगता हैं कि लोकसभा चुनाव में कांगे्रस के साथ बसपा के गठबंधन की जो उम्मीद की गई थी वो पूरी होती नजर नही आ रही है। यदि बसपा 2019 के लोकसभा चुनाव में कांगे्रस से अलग राह अख्तियार करती है तो इससे कांगे्रस की परेशानी में और भी इजाफा होगा। क्योकि यूपी में बसपा का जहां कांगे्रस से काफी मजबूत जनाधार माना जाता है वहीं कांगे्रस की अभी तक की जो हालत नजर आती है वो काफी कमजोर ही कही जायेगी। कांगे्रस का 2014 के लोकसभा चुनाव से शिकस्त का जो दौर आरंभ हुआ था वो आज तक जारी हैं। लोकसभा के बाद कई राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांगे्रस को भाजपा के हाथों पराजय का सामना करना पडा है। हालांकि ये भी कहना पूरी तरह से सही नही होगा कि कांगे्रस की हालत मेें कोई सुधार नही होता दिखाई देता है लेकिन ये भी सच हैं कि जिस तरह से भाजपा के नेता अपनी बात जनता के सामने प्रभावी तरह से रखने में सक्षम नजर आते हैं। वैसा कांगे्रस में नही हो पा रहा हैं। कांगे्रस की कमान राहुल के हाथ में आने के बाद से राहुल गांधी कांगे्रस को अपने सबसे खराब दौर से निकालने के लिए हरमुमकिन प्रयास कर रहे हैं। लेकिन फिर भी कांगे्रस की नैया अभी किनारे से काफी दूर ही दिखाई देती हैं। कांगे्रस को यदि लोकसभा चुनाव में मजबूत तरह से भाजपा का मुकाबला करना है तो उसे बसपा का दामन नही छोडना चाहिए। क्योकि 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा को भले ही राजनीतिक तौर पर काफी नुकसान उठाना पडा हो लेकिन वर्तमान समय यूपी मेे दलितों का रूझान एक बार फिर से बसपा की ओर होता दिखाई दे रहा हैं। बसपा दलितों के साथ मुसलमानों को भी अपने पक्ष में करने में जुटी हुई हैं। ऐसे में यदि बसपा.सपा और कांगे्रस का यूपी में मजबूत गठबंधन बनता है तो फिर इससे कांगे्रस अपने खराब दौर से निकलनें में कामयाबी हासिल कर सकती हैं। जहां तक बसपा प्रमुख मायावती का ये कहना कि राहुल और सोनिया गांधी तो बसपा के साथ गठबंधन चाहते हैं। लेकिन कांगे्रस के ही कुछ नेता नही चाहते तो उनका ये कहना काफी हद तक सही हो सकता हैं। वैसे भी ये एक कडवी हकीकत हैं कि कांगे्रस के ही कुछ नेताओं ने कागे्रस की नैया डुबोने का काम किया है। कांगे्रस में हमेशा से ऐसे लोग रहे हैं कि जो रहे तो कांगे्रस में मगर उनकी सोच पार्टी की नीतियों के अनुसार नही रही और ऐसे कई नेताओं ने कांगे्रस का साथ छोडने में उस समय जरा भी देर नही लगाई कि जब कांगे्रस का बुरा दौर आरंभ हुआ तो उन्होंने अपने स्वार्थ के लिए दूसरे दलो का दामन थाम लिया। आज कांगे्रस पर जो बुरा दौर है उसके लिए कांगे्रस के पूर्व के कई नेताओं की गलतियां भी जिम्मेंदार हैं। जिनका खामियाजा कांगे्रस को आज तक भुगतना पड रहा है। वैसे जहां तक दिग्विजय सिंह की बात है तो मायावती ने उन पर जो आरोप लगाए हैं कि वो भाजपा और आरएसएस को फायदा पहुंचाने का काम कर रहे हैं तो दिग्वििजय सिंह का जो नजरिया आरएसएस और भाजपा को लेकर हमेशा से रहा है उससे सभी वाकिफ हैं। बसपा प्रमुख के बयान पर दिग्विजय सिंह ने ये बात कही भी है। इस मामलें में पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेष यादव ने काबिले तारीफ बात कही उन्होने कहा कि कांगे्रस को गठबंधन के लिए अपना दिल बडा करना चाहिए। बहरहाल आज कांगे्रस के लिए सबसे बडी जिम्मेंदारी आगामी लोकसभा चुनाव में एक मजबूत महागठबंधन तैयार करने की हैं।

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