मुसलमानों की तकलीफ को बयान करती मुल्क

मुसलमानों की तकलीफ को बयान करती मुल्क

शिबली रामपुरी

कुछ साल पहले तक फिल्में देखने का काफी  शौक  हुआ करता था।

लेकिन जब देखा कि सिनेमा का स्तर गिर रहा हैं और हमारे बालीवुड के निर्माता निर्देकों का मकसद सिर्फ पैसा कमाना भर रह गया हैं। जिसके चलते वो फिल्मों में गालियों तक का खूब प्रयोग करने लगे हैं और उस पर उनकी दलील ये हैं कि सिनेमा में वो दिखाने का प्रयास किया जाता हैं जो समाज में चल रहा होता है।लेकिन ऐसी सोच रखने वाले ये क्यूं भूल जाते हैं कि फिल्मे देष की एक बडी आबादी खास तौर पर युवा वर्ग के दिलो दिमाग पर काफी गहरा असर करती हैं। ऐसे में क्या ऐसी फिल्में नही बनायी जानी चाहिए कि जो समाज को युवा वर्ग को एक बेहतर संदेश दे सके और उनको अच्छाई की तरफ पे्ररित कर सकें।ऐसा भी नही हैं कि सभी फिल्म वाले सिर्फ पैसे कमाने की अंधीदौड में ही जुटे हों। कुछ अनुभव सिन्हा जैसे काबिल फिल्मकार भी बालीवुड मे हैं जो मुल्क जैसी बेहतरीन फिल्म बनाकर एक वर्ग के दर्द को उसकी तकलीफ को देश के सामनें रखते हैं। जो एक मुस्लिम परिवार के एक युवक के गलत राह पर चलने और उसकी सजा किस तरह से सामाजिक रूप से पूरे परिवार को भुगतनी पडती हैं।जो लोग कल तक इस परिवार के हर दुख दर्द में शमिल हुआ करते थे वो किस तरह से एक युवक के गलत राह पर चलने की सजा परिवार के एक एक इंसान को अपमानित करके देते हैं। अनुभव सिन्हा वास्तव में बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने जहां मुल्क जैसी फिल्म बनाकर आज के सिनेमा के गिरते स्तर को बचाने का प्रयास किया हैं। वहीं एक समुदाय जो अनेकों बार उस कार्य की सजा भी भुगतता चला आ रहा हैं कि जो उसने नही किया या उसके किसी रिशदार या घर के किसी सदस्य ने अंजाम दिया था उस समुदाय की तकलीफों को जनता के सामने रखकर ये पैगाम दिया हैं कि आतंकवाद का कोई मजहब नही होता और आतंकवाद किसी एक प्रकार का भी नही होता हैं।फिल्म में वकील का किरदार निभा रहे आशुतोष राणा और तापसी पन्नू के बीच बहस कई सवाल खडे करती हैं कि कैसे एक समुदाय से ताल्लुक रखने वाले लोगों का जुर्म साबित होने से पहले ही सामाजिक तौर पर कसूरवार ठहरा दिया जाता हैं।दरअसल हम तमाम प्रयासों के बावजूद भी इस हकीकत को नजरअंदाज नही कर सकते हैं कि जब से राजनीति पर फिरकापरस्ती का रंग चढा है तभी से एक समुदाय की समस्याओं में इजाफा हुआ है और उसकी वतनपरस्ती पर भी निशना लगाने का प्रयास किसी ना तरह से होता रहता हैं। मुल्क फिल्म में मुस्लिम परिवार के मुखिया का ये सवाल काफी कुछ सोचने पर मजबूर करता हैं कि वो कैसे अपने वतन से मौहब्बत को साबित करें कि वो अपने मुल्क से प्यार करते हैं।प्यार कोई दिखाने की चीज नही हैं।मुल्क फिल्म का जिक्र करना इसलिए जरूरी हैं कि काफी वक्त से ऐसी फिल्मों की भरमार सी हो चुकी थी कि जिसमें एक वर्ग के लोगों को जालिम के तौर पर पेष किया जा रहा था।हालांकि ऐसा नही हैं कि सब जगह सभी लोग अच्छे ही होते हैं लेकिन सब जगह सभी लोग बुरे भी तो नही होते हैं। ये भी एक हकीकत हैं कि आर्थिक और तालीमी तौर पर कमजोर रहने की वजह से भी मुसलमानों को काफी नुकसान उठाना पडा हैं।यदि मुसलमानों में तालीमी तौर पर काफी मेहनत की जाती तो ये समाज इतना बदहाल नही होता कि जितना आज हैं। हालांकि अभी कुछ दिन पहले ही एक खबर सामने आई जिसमें बताया गया था कि एक सर्वे से इस बात का खुलासा हुआ हैं कि मुसलमानों में बेहतर से बेहतर शिक्षा हासिल करने का रूझान पहले से काफी बढा है और मुस्लिम युवकों के मुकाबले मुस्लिम लडकियां ज्यादा संख्या में शिक्षा हासिल कर अपना भविष्य उज्जवल बनानें का प्रयास कर रही हैं।हालांकि ये प्रतिशत पहले के मुकाबले कुछ ज्यादा तो नही बढा है मगर फिर भी जिस समाज में हमेशा से बदहाली के लिए अशिक्षा को जिम्मेदार माना जाता रहा हो और हकीकत भी यही हैं कि शिक्षा के अभाव से ही किसी भी समाज और कौम में बदहाली आती हैं और शिक्षा के माध्यम से ही बदहाली से निजात हासिल होती हैं।ऐसे में मुसलमानों मे शिक्षा के प्रति बढता रूझान एक काबिले तारीफ और खुशी की बात ही कही जायेंगी। जिसके आने वाले समय में काफी बेहतर नतीजें सामने आने की उम्मीद हैं। मुसलमानों को अब खुद अपनी ओर से ही शिक्षा के मैदान में प्रयास करने की जरूरत हैं। क्योकि सरकारों के भरोसे रहने की वजह से ही मुसलमान तरक्की के हर मामलें में पिछडते चले गए और उनकी हालत बदहाल से बदहाल होती गई। अनुभव सिन्हा को मुबारकबाद कि उन्होंने मुल्क जैसी फिल्म बनाकर मुसलमानों की एक प्रमुख समस्या की हकीकत को गहराई से सामने रखा है।

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