हां में मंगलौर हूं।—haan men manglour hun की किस्त-04, जिस में क़ारी नसीम मंगलौरी द्वारा मंगलौर में बसी बिरादरियों में से कुछ का इतिहास बताने की कोशिश की गई है।

हां में मंगलौर हूं।—haan men manglour hun की किस्त-04, जिस में क़ारी नसीम मंगलौरी द्वारा मंगलौर में बसी बिरादरियों में से कुछ का इतिहास बताने की कोशिश की गई है।

किस्त-04
क़ारी नसीम मंगलौरीइतिहास अतीत का दर्पन होता है। अपने भविष्य को खूबसूरत बनाये रखने के लिए अतीत पर निगाह रखना बडा ही महत्वपूर्ण होता है, जो अपने अतीत को भूल जाता है, वह एहसासे कमतरी का शिकार हो जाता है। जो अपने अतीत से सबक लेता है उसका वर्तमान भी चमकता है, और भविषय भी रोशन होता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए जनपद हरिद्वार के मंगलौर कस्बे के इतिहास पर कारी नसीम मंगलौरी द्वारा लेख लिखा जा रहा है। जो कि गोल्डन टाइम्स में किस्तों में प्रकाशित किया जा रहा है। इस किस्त को पढने और समझने के लिए किस्त नं0-01, 02 व 03 को जरूर पढें।
हां में वही मंगलौर हूंू, जिसमें झबरेडा, राजूपुर, मिलकपुर, नारसन ग्रामीण क्षेत्रों समेत कई अन्य जगहों से मुस्लिम जोलाहे (अंसारी) बिरादरी के लोग मंगलौर में सूरी सडक एवं किले के बराबर वाली जगहों पर बस गये। राजूपुर से आने वाले कुछ लोग जिस जगह बसे उसे आज मोहल्ला बन्दरटोल कहा जाता है। इस परिवार ने यहां शूरूआत में केले और पोंडे की काश्त की। जिसमें उन्हें साल दर साल खूब मुनाफा हुआ, जिससे इन्होंने जमीन की भी खूब खरीदारी की, कुछ ने बाग़ात का भी कार्य किया। और फिर एक बडी ही आलीशान हवेली तामीर कराई, जिसका एक बडा हिस्सा आज भी मोजूद है। (इस हवेली वाले परिवार का एक मजबूत अंग हाईवे पर भी आबाद हैं। उनमें आज भी पुरानी सियासी बू पाई जाती है)। इस हवेली में रहने वालों ने ही किले से बाहर राजनीति में कदम रखा। जिसके बाद मंगलौर की राजनीति किले में काजी परिवार और किले से बाहर इस हवेली में रहने वाले परिवार ने संभाली, जोकि आज तक जारी है। दो जगहों पर राजनीति होने के बावजूद कभी भी इन दोनों (काज़ी परिवार और हवेली परिवार) में आपसी रंजिश और आपसी मुखालफत पैदा नहीं हुई। दोनों ने ही साफ सुथरी सियासत की। एक दूसरे के यहां बराबर आते जाते रहे,(लेकिन अब हालात बदल चुके हैं)। इस वक्त हवेली वालों में पूर्व विधायक सरवत करीम अंसारी, कलीम अंसारी, जुलफिकार अंसारी सियासत में पूरी तरह सरगरम हैं, एवं पूर्व विधायक मरहूम सईद अंसारी साहब की ओलाद मोहल्ला किला में आबाद हैं। इस समय यूं तो इस बिरादरी में हवेली के अलावा भी कई अन्य व्यक्ति भी सियासी मैदान में हैं। जिनमें मोहल्ला पठानपुरा में पूर्व चैयरमेन नफीस अंसारी, मलकपुरा में जमीर हसन अंसारी समेत दर्जनों छोटे बडे नेता मोजूद हैं। इसी क्रम में मोहल्ला लालबाडा व आस पास क्षेत्र में कई मुस्लिम और कई गैर मुस्लिम नेता हैं, जिनमें मास्टर नागेन्द्र, डाॅ0 संजीव जैन आदि एवं यूवा नेता सुशील राठी कई वर्षों से सियासत में सरगरम हैं।
हां में वहीं मंगलौर हूं। जिसमें राजूपुर और रहतपुर आदि से आने वाले कुछ लोग एक नई बस्ती में बस गये, जिसे मोहल्ला सराय अजीज कहते हैं। उस बस्ती में बसने वाले कुछ लोगों को आज भी रहतपुरये कहा जाता है। जबकि इसी के एक हिस्से को पूरा कहते हैं, उसमें अधिकतर अंसारी बिरादरी के लोग आबाद हैं। मिलकपुर आदि से आने वाले चन्द लोग किले के बराबर में बसे उस बस्ती को आज मलकपुरा कहा जाता है। इस मलकपुरे में मिलकपुर के अलावा भी कई जगहों से अंसारी बिरादरी के लोगों ने अपना बसेरा बसाया। इसके अलावा अन्य जगहों से आकर अंसारी बिरादरी के लोग मलकपुरा के अलावा अन्य बस्तीयों बन्दरटोल, लालाबाडा, बाहरकिला, पीरगढी, सरायअजीज, टोली, पूरा, पठानपुरा मलानपुरा आदि में भी आबाद हुए। इसी तरह अन्य बिरादरी के लोग आते रहे, और बसते गये। यह सिलसिला आज तक जारी है। गत वर्षों में भी कोलका आदि से पलायन करके अंसारी और तेली बिरादरी के लोगों ने पठानपुरा में आबादी को बढाया है। यहां यह बात भी काबिले जिक्र है कि मलकपुरा आदि में रहने वालों को अधिकतर जुलाहे (जोलाहे) कहा जाता है, इसकी एक वजह यह भी मिलती है कि जोलाहे सही शब्द जो पलस लाह है, जिसका अर्थ धागा व लई बनता है। पुराने वक्त में यह लोग धागे चिपकाने व कपडे बुनने का कार्य करते थे। इस कारण उन्हें बुनकर के नाम से भी पुकारा जाता था। आज भी एक दो जगहों पर चादर की शक्ल में कपडे बुनाई का कार्य किया जाता है।
हां में वही मंगलौर हूं। जिसमें दूसरे शहरों से कारोबार से सिलसिले में कुछ पठान भी मंगलौर आये, और फिर उनमें से भी कुछ यहीं के होकर रह गये। कुछ पठान एक तालाब के किनारे बसे। उस जगह को पठानों वाली बस्ती कहा जाने लगा। जिसे आज पठानपुरा कहा जाता है। पठानपुरा में जिस्म की क़द्दो कामत से हिसाब से तो पूर्व सभासद मरहूम मुन्शी खान के बाद तो कोई पठान नजर नहीं आता। बिरादरी के तौर पर अच्छी खासी तादाद मोजूद है। इन पठानों के पुराने लोग हुक्के की नेल बांधते और उस पर रेशम चढाने का कार्य करते थे, उनके कार्य के नाम की वजह से उन्हें नेलबन्द कहा जाने लगा। बाद में यह नाम बिगाड कर रचबंदे कर दिया गया। आज भी पठानपुरा में रहने वाले इन पठानों को रचबंदों के नाम से ही जाना जाता है। जिस तालाब के पास यह लोग बसे थे, वह तालाब रचबदों वाली जोहडी के नाम से प्रसिद्व है। उस तालाब के आबादी में आने के कारण उसका नामों निशान तक मिट गया। यहीं पर एक मस्जिद भी है जिसे रचबदों वाली मस्जिद कहा जाता है। दूसरी ओर अधिकतर पठान सराये अजीज के पास वली बस्ती में बसे। जिनका शजरा अफ़ग़ानी पठानों से मिलता है। इनमें कुछ ने जमीन की खरीदारी करके जमींदारी का कार्य किया और जमींदार कहलाये। इन्हीं पठानों में से कुछ लोगों ने जमीन की पैमाईश आदि का कार्य किया उन्हे मिर्ध कहा जाने लगा। और उन्हीं के नाम से मनसूब करते हुए इस बस्ती का नाम आज तक मिर्धगान चला आ रहा है। (इस बस्ती में रहने वाले पठान अब इसे खानपुरा कहते और लिखते हैं)। इसी बस्ती में एक बुजूर्ग का मजार भी है। वहीं एक मशहूर आलिम भी हुए जिन्हें तारीख़ मौलाना गुल मुहम्मद खान साहब के नाम जानती है। दारूल उलूम देवबन्द के पूर्व वरिष्ट प्रचारक मौलाना सय्यद अबुलकलाम कासमी के अनुसार मौलाना गुल मुहम्मद खान साहब दारूल उलूम देवबन्द में एहम पद पर कार्यर्त थे। मौलाना गुल मुहम्मद खान साहब ने दारूल उलूम देवबन्द के पूर्व मोहतमिम हकीमुल इस्लाम कारी मुहम्मद तय्यब साहाब को शरह विकाया (आलमियत की अहम पुसतक) पढाई है। (हवाला देखें हयाते तय्यब)।
हां में वही मंगलौर हूं। जिसमें मुल्लान (मोलाना) मुहम्मद ताहिर के नाम से मनसूब मोलानापुरा आज का मलानपुरा में भी कई जगहों से आकर मुसलमान आबाद हुए, जिनमें तबक्ली (जोकि दताना से आये थे, उनमें कई पुश्त पूर्व कुछ लोग शिया भी थे।), आज भी इस मोहल्ले में कई खानदान अपने आबाओ अजदाद के नाम से ही मशहूर हंै। जैसे बख़्शी खानदान, पीरजी खानदान, पटवारी खानदान आदि। ईदगाह वाली मस्जिद के निकट जिन बुजुर्ग का मजार है वह इसी पीर जी कबीले से हुए है। पटवारी कबीला का पुशतेनी सम्बंध जौरासी गांव से रहा है। यह कबीला एक जंग के दोरान उजड कर यहां आबाद हुआ। इन्हीं में से कुछ लोग राजूपुर, देवबन्द में भी बसे। इस बस्ती में एक मस्जिद भी है, जिसे 1271 हिजरी यानी 1854 ईस्वीं में बीबी क़ुतबुन्निसा पुत्री सय्यद फ़ज़ल अली ने तामीर कराई थी। यह बीबी कुतबुन्निसा पटवारी खानदान से हैं। 1867 के बन्दोबस्त में इस मस्जिद व बीबी के पिता का विवरण देखा जा सकता है। यही वह बस्ती है जहां आजादी से पूर्व एक मुशायरा में कांग्रेसी व मुस्लिम लीगी ज़हनियत वाले शायर खूब गुत्थम गुत्था हुए थे। वर्षों पूर्व इस मोहल्ले में निकलने वाला ताज़िया व अखाडा भी मशहूर रहा है। इस बात को पुराने लोग बडे ही चटखारे लेकर बताते हैं। वहीं फ़ारसी जुबान की मशहूर शायरी की पुस्तक “क़रक़फ़े बलाग़त“ के ख़ालिक़ शायर मरहूम ख़लीफ़ा मुहम्मद सिद्दीक़ साहब का सम्बंध भी इसी मोहल्ले से है। उनकी यह पुस्तक “क़रक़फ़े बलागत“ 1914 में प्रकाशित हुई थी। 
हां में वही मंगलौर हूं। जहां मुजफ्फरनगर के बरला क्षेत्र एवं छोटी बडी नारसन, नगला कोयल, कोलका, सुलतानपुर, शेरपुर जुड्डा, रेता नगला, करनपुर, बूडपुर, मुहम्मदपुर आदि जगहों से तेली बिरादरी के लोग मोहल्ला किला, बन्दरटोल, पठानपुरा आदि मोहल्लों में बसे। इस बिरादरी के लोगों ने विभिन्न कार्य किये। घोडा बुग्गी चलाना, भेंसे आदि का पालना लकडियां खरीदना व उन्हें चीरना आदि सहित अनेक व्यवसाये किये। कुछ अब भी अपने पुशतेनी व्यवसाय में ही लगे हुए हैं। इस बिरादरी के कई लोगों ने खूब नाम कमाया है।(उनका विवरण अगली किस्तों में अयेगा।) इस वक्त इस बिरादरी के युवाओं में पढने लिखने का खूब करेज देखा जा रहा है। आज कुछ युवा अपनी मेहनत से उच्च पदों पर देश सेवा कर रहे हैं। 
इसी क्रम में कस्साब यानी कुरैशी बिरादरी के लोग भी विभिन्न शहरों से आकर मोहल्ला किला एवं मलानपुरा आदि में आबाद हुए। कुरैशी बिरादरी के लोग कब और कहां से मंगलौर आये इसकी सही जानकारी तो प्राप्त नहीं हो सकी। मगर 1867 के बन्दोबस्त में इनके पुश्तेनी बसने का जिक्र मिलता है। शूरू में कुछ लोगों ने पुश्तेनी कारोबार किया, जोकि आज तक जारी है। उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले इस बिरादरी के लोगों ने अपना अलग व्यापार एवं सरकारी मुलाज़मत हासिल की। कुरैशी बिरादरी के ही मरहूम नूर बख़्श साहब मंगलौर पालिका में वाइस चैयरमेन भी रहे हैं। जिनके कई सराहनिय कार्यों को लोग आज भी याद करते हैें। वहीं खलील अहमद कुरैशी भी कुछ समय तक पालिका के कार्यकारी चैयरमेन रहे। यहां यह बात भी काबिले जिक्र है कि मंगलौर के तकरीबन सभी मोहल्लों में आबाद मुसलमानों में वह लोग भी शामिल हंै जोकि कनर्वट मुस्लिम हंै। विभिन्न मोको पर मुसलमान हुए हैं। इस तरह के शजरे को देखने के लिए 1867 आदि का बंदोबस्त देखा जा सकता है, जिसमें यह बात साफ हो जाता है कि वह कोन से परिवार हैं, जिनके बडे कनर्वट हो कर मुसलमान हुए हैं।
 हां में वही मंगलौर हूं। जिसके दो मोहल्लों में झोजे कबीले के लोग आबाद हैं। इस कबीले के लोग वहां वहां बसे जहां हजरत सैय्यद सालार मसऊद ग़ाजी (जिनका मज़ार बहराईच में हैं) का गुजर हुआ या उन्होंने भेजा। यह लोग अरबी झुजाह कबीले जिसे जन्जूई कबीला भी कहा और लिखा गया। उन्हीं में से कुछ लोगों ने मंगलौर को अपना वतन बनाया। इसके अलावा इस कबीले के लोग हिन्दुस्तान के विभिन्न शहरों में भी बसे। जिनमें मुरादाबाद, बिजनोर, बुलन्द शहर, मेरठ कमिशनरी के मुजफ़्फ़रनगर, जानंलधर आदि शामिल हैं। आज इसी झुजाह/जनजूई कबीले को झोजा कहा जाता है। झोजा अरबी शब्द झुजाह, शब्द का हिन्दी प्रवर्तन है। जिसका अर्थ जंगजू है, और झुजाह का अर्थ भी जंगजू ही है। यह लोग अरबी नस्ल से हैं। अत तहक़ीक़ व रामपुर गजेटिर 1911, दि लीड गजनवीड्ज एवं मराते मसऊदी नुस्खा झोजा व तारीखे झोजा, नामी पुस्तकों से पता चलता है कि यह बिरादरी अकीली शाख़ हाशमिया से है। इस लिए कुछ लोग अपने नाम के साथ हाशमी और सालार मसऊद गाजी की निस्बत से गाजी भी लिखते हैं। जिला ओकाडा की तहसील दीपालपुर के 1871 के बन्दोबस्त के अनुसार झोजा अरबी नस्ल से है। अरब में इस कबीले को आज भी झुजाह के नाम से ही जाना जाता है। इस कबीले के लोग मोहल्ला टोली एवं मोहल्ला पीरगढी में आबाद हैं। बाकी अगली किस्त में……………..

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