हां में मंगलौर हूं।———-क़ारी नसीम मंगलौरी——किस्त-03

हां में मंगलौर हूं।———-क़ारी नसीम मंगलौरी——किस्त-03

क़ारी नसीम मंगलौरी

इतिहास अतीत का दर्पन होता है। अपने भविष्य को खूबसूरत बनाये रखने के लिए अतीत पर निगाह रखना बडा ही महत्वपूर्ण होता है, जो अपने अतीत को भूल जाता है, वह एहसासे कमतरी का शिकार हो जाता है। जो अपने अतीत से सबक लेता है उसका वर्तमान भी चमकता है, और भविषय भी रोशन होता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए जनपद हरिद्वार के मंगलौर कस्बे के इतिहास पर ये लेख लिखा जा रहा है। जो कि गोल्डन टाइम्स में किस्तों में प्रकाशित किया जा रहा है। इस किस्त को पढने और समझने के लिए किस्त नं0-01 व 02 को जरूर पढेंः-सम्पादक

किस्त-03

हां में मंगलौर हूं। हां में वहीं मंगलौर हूॅ। 1775 ईस्वीं में गरीब सिंह द्वारा किये गये आक्रमण में हुए नुक्सान की भरपाई में मंगलौर वासियों को कई वर्ष लगे। मगर कुछ चीजों की तो आज तक भी भरपाई नहीं हो सकी। इसी दौरान आक्रमण में शदीद ज़ख़्मी हुए रईसे मंगलौर काजी शुजाउद्दीन एक वर्ष तक सख्त बीमार रहते हुए 22 रजब 1190 हिजरी यानी 6 सितम्बर 1776 को मौत की आगोश में सो गये। जिनकी औलादें आज भी मंगलौर, पुरकाजी़, और पाकिस्तान में आबाद है। काज़ी शुजाउद्दीन की मौत के बाद उनके बेटे मौलाना काजी सय्यद मुहम्मद अली मंगलौर के रईस कहलाये। हां में वही मंगलौर हूं, जिसमें मौलावी गयासुद्दीन मंगलौरी के यहां पैदा होने वाले मोलवी सय्यद नसीरूद्दीन मंगलौरी ने हजरत सय्यद अहमद शहीद की तहरीक (अभियान) में शामिल हो कर बालाकोट की लडाई में न केवल शिरकत की बल्कि सय्यद अहमद शहीद की बालाकोट की इस लडाई में शहादत के बाद उनकी इस तहरीक की कमान भी  संभाली। (मोलवी सय्यद नसीरूद्दीन मंगलौरी के जीवन की विवरण अगली किस्तों में आयेगा)।
इसी दौरान आस पास के क्षेत्रों से कुछ गैर मुस्लिम (हिन्दू, सिख, जैन) मंगलौर में आकर बसने लगे। यूं तो हजरत शाह विलायत रह0 के दौर से ही मंगलौर में गैर मुस्लिम (हिन्दू, सिख, जैन) आने जाने लगे थे। हजरत शाह विलायत से केवल मुसलमान ही नहीं बल्कि गैर मुस्लिम और राजा महाराजा भी बडी अकीदत रखते थे। जिनमें राजा अमरदेव आदि का नाम लिया जा सकता है। मंगलौर के मुसलमानों ने गैर मुस्लिमों (हिन्दू, सिख, जैन) को गले लगाया, और उन्हें यहां आबाद किया। बाहर से आने वाले इन गैर मुस्लिमों (हिन्दू, सिख, जैन) ने किले के बायीं ओर मोहल्ला लालबाग़ (बताया जाता है कि गैर मुस्लिमों में कोई लाल सिंह थे, जिन्होंने यहां एक बाग़ लगाया था, जिसे लाला का बाग़ कहा जाता था। आहिस्ता आहिस्ता यह बाग़ आबादी में तबदील होता गया, और फिर इस बस्ती को लालबाग़ के नाम से जाना जाने लगा। जिसे बिगाड कर अब लालाबाडा कहा जाता है। घनी आबादी होजाने के कारण उस बाग़ का अब कोई निशान तक मोजूद नहीं है।) आजादी के बाद इस बस्ती को कई हिस्सों में तकसीम कर दिया गया। ब्रहमनाना, कायस्थान सरावज्ञान, मानक चैक आदि एवं जैन गली सब इसी के हिस्से हैं। वहीं किले से बाहर बसी इस बस्ती के बराबर में एक बस्ती ओर बसाई गई, जिसमें बाहर से आने वाले मुसलमान आबाद हुए, उस बस्ती को उस समय के नायब मुफती मुल्लान मुहम्मद ताहिर के नाम से बासाया गया। जिसे आज मोहल्ला मलानपुरा कहा जाता है। इसी तरह मोहल्ला किले के बीचांे बीच एक छोटी सी बस्ती को चिडयाकोट के नाम से पुकारा जाता है, यह भी उस समय के नायब काजी मौलाना मुहम्मद ताहिर चिरयाकोई के नाम से मनसूब है। 
हां में वही मंगलौर हूं, जिसके सपूतों ने देश की आजादी में भी बढचढ कर हिस्सा लिया। मंगलौर निवासी मरहूम क़ाज़ी सय्यद अर्शी काजमी बताया करते थे कि जिस वक्त मंगलौर पर अंग्रेजों ने हमला किया था, उस समय सभी ने मिल जुल कर उनका मुकाबला किया था। वो बताते थे कि जिस समय अंग्रेज मंगलौर की सरहद में देवबन्द की तरफ से दाखिल हुए तो मंगलौर के किले के सभी दरवाज़े बन्द कर दिये गये। अंग्रेजों ने अपना पडाव सूरी सडक की बाई ओर डाला, उस जगह अब नई बस्ती इस्लामनगर के नाम से जानी जाती है, जोकि मोहल्ला बन्दटोल का हिस्सा है। मंगलौर को छोटी से बस्ती समझते हुए मंगलौर वासियों से कोई बडा खतरा नहीं है, यह मानते हुए अगले रोज दिन में हमले की योजना बनाई। यहां यह बात भी काबिले जिक्र है कि आजादी की लडाई के लिए यहां से भी आवाजें बुलन्द हो रही थीं। अश्,शजरतुल मुबारकतुल काजमिया के अनुसार यहां कुछ लोग एसे भी थे कि जिन्होंने अपनी सोच के अनुसार अंग्रेज़ों का साथ तो नहीं दिया मगर तहरीके आजादी का विरोध किया। आजादी की लडाई लडने वाली कांग्रेस का विरोध किया। (आजादी की आवाज को बुलन्द करने वाले भारत के सपूतों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का विवरण अगली किस्तों में आयेगा)। आजादी की लडाई के लिए यहां से उठने वाली आवाजों के कारण अंग्रेेज इस छोटी सी बस्ती मंगलौर से भी खार खाये हुए थे। दूसरी तरफ अंग्रेजों द्वारा मंगलौर पर आक्रमण की सूचना नवाब नजीबुद्दोला को भी मिल चुकी थी। (नवाब नजीबुद्दोला का मंगलौर से बडा ही लगाव था, बडी अकीदत थी)। सूचना मिलते ही वह मंगलौर किले की सूरक्षा के लिए चल पडा। इधर रात के अधेरे में मंगलौर वासियों ने अंग्रेजों पर हमले की योजना बनाई। जिसके अनुसार हर घर में मिर्च डाल कर पानी पकाया गया, इस गर्म पानी को लेकर महिलायें आगे आगे चलीं वह आराम कर रहे अंग्रेजांे पर पानी डालती जाती पिछे से मंगलौर वासी उनपर लाठीयां बरसाते जाते। अचानक हमले से अंग्रेज सभल नहीं पाये, और उन्होंने भाग कर जान बचाई। यहां से अंग्रेज गंगा की तरफ भागे। जहां उनका मुकाबला मगंलौर के लिए आरहे नवाब नजीबुद्दोला के लश्कर से हुआ। इस हमले में मंगलौर वासियों का कोई जानी नुकसान नहीं हुआ। और मंगलौर का किला व मंगलौरवासी भी सुरक्षित रहे।
एक रिकाॅर्ड के अनुसार उस समय मंगलौर की आबादी लगभग 4900 के आस पास थी। वहीं सहारनपुर गजेटियर (एचआर नेविल इलाहाबाद 1990), रोशनी का सफर (प्रोफेसर तनवीर चिश्तिी की तरतीब शुर्दा पुस्तक) के अनुसार वर्ष 1847 में मंगलौर की आबादी 5,959 थी। इसी क्रम में वर्ष 1881 में 9,990 वर्ष 1891 में 10,783 आबादी थी। (जिनमें 7,650 मुस्लिम, 3,059 हिन्दू, 74 सिख, इसाई एवं जैन शामिल हैं।) जिस तरह ओर जगहों पर आबादी में कई गुना इज़ाफ़ा होता रहा है, मंगलौर में आबादी उतनी तेजी से नहीं बढी। आंकडों के अनुसार वर्ष 1981 में 25,926, वर्ष 1991 में 34,100 वर्ष 2001 में 42,782, नगर पालिका के रिकार्ड के अनुसार वर्ष 2011 में 50,971 जबकि इस समय लगभग 70 हजार के आसपास है। 2011 से लेकर अब तक 20 हजार की बढोतरी इस लिए नजर आ रही है, कि पिछलेे कई वर्षों से गाॅव दिहात से लोग पलायन करके मंगलौर के चारों ओर बस रहे है। आजादी से पूर्व यहां लगभग 17 मस्जिदें और 06 मन्दिर थे। इस समय मंगलौर में लगभग 68 मस्जिदें, 33 छोटे बडे मंदिर हैं जिनमें प्राचीन मन्दिर, जैन मंदिर एवं कोतवाली व पुलिस चैकी का पूजा स्थल भी शामिल हंै। (सभी धार्मिक स्थलों के नाम अगली किस्तों में आयेंगे)। हां में वही मंगलौर हूं, जिसे 1860 में टाउन क्षेत्र घोषित किया गया, और 1950 में नगर पालिका के रूप में पहचान मिली। मंगलौर में एक चर्च का भी जिक्र मिलता है। इसी तरह 20 वीं सदी की दूसरी व तीसरी दहाई में मंगलौर में एक एंगलों वर्नेकुलर स्कूल भी चलता था। हां में वही मंगलौर हूूं, जिसमें मुसलमान और हिन्दू आबाद हुए मुसलमानों ने अपनी इबादतगाहें (मस्जिदें) और हिन्दूओं ने अपने पूजा स्थल (मन्दिर) बनाये। दोनों समुदाय हमेशा से आज तक मिलजुल कर रहते आ रहे हैं। मंगलौर की इस हिन्दू मुस्लिम एकता की बहुत सी मिसाले मोजूद हैं। आज भी लोग चैधरी आनन्द व फूल सिंह जैसे लोगों की मिसाल देते नहीं थकते।
हां में वही मंगलौर हूं, जिसमें सय्यद मुहम्मद अहमद काजमी ने जन्म लिया। जिन्होंने पाकिस्तान के संस्थापक कायदे आजम मुहम्मद अली जिनाह के प्रस्ताव/पेशकश को ठुकरा दिया था। जिसमें जिनहा ने उनसे कहा था कि आप मुस्लिम लीग एवं पाकिस्तान के बनाये जाने का विरोध न करें, और हमारे साथ पाकिस्तान चलें, आपको पाकिस्तान का प्रथम प्रधानमन्त्री बानाया जायेगा। मगर सय्यद मुहम्मद अहमद काजमी ने पाकिस्तान जाने से साफ इनकार करते हुए कहा था कि मेरी रग रग में हिन्दुस्तान बसता है, इसे छाडने के बारे में, में सोच भी नहीं सकता। बाकी अगली क़िस्त में……………..

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