हां में मंगलौर हूं।—haan men manglour hun की किस्त-05, जिस में क़ारी नसीम मंगलौरी द्वारा मंगलौर में बसी बिरादरियों में से कुछ का इतिहास बताने की कोशिश की गई है।

हां में मंगलौर हूं।—haan men manglour hun की किस्त-05, जिस में क़ारी नसीम मंगलौरी द्वारा मंगलौर में बसी बिरादरियों में से कुछ का इतिहास बताने की कोशिश की गई है।

हां में मंगलौर हूं।
किस्त-05
क़ारी नसीम मंगलौरी

इतिहास अतीत का दर्पन होता है। अपने भविष्य को खूबसूरत बनाये रखने के लिए अतीत पर निगाह रखना बडा ही महत्वपूर्ण होता है, जो अपने अतीत को भूल जाता है, वह एहसासे कमतरी का शिकार हो जाता है। जो अपने अतीत से सबक लेता है उसका वर्तमान भी चमकता है, और भविषय भी रोशन होता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए जनपद हरिद्वार के मंगलौर कस्बे के इतिहास पर कारी नसीम मंगलौरी द्वारा लेख लिखा जा रहा है। जो कि गोल्डन टाइम्स में किस्तों में प्रकाशित किया जा रहा है। इस किस्त को पढने और समझने के लिए किस्त नं0-01, 02, 03 एवं 04 को जरूर पढें-
सम्पादक दैनिक गोल्डन टाईम्स।

हां में वही मंगलौर हूंू। जिसमें सय्यद, शेख़ज़ादे, जोलाहे (अंसारी), तेली, रहतपुरये, पठान, कस्साब (कुरैशी), झोजो के अलावा रंगसाज (पूर्व नाम कमांगर है, पहले यह लोग कमांगरी का कार्य किया करते थे, बाद में यह व्यवसाय खत्म हो गया, और यह लोग रंगसाजी का कार्य करने लगे, इस कार्य की वजह से यह लोग रंगसाज के नाम से ही जाने जाते हैं), सक़्क़े (पूर्व नाम भिश्ती है जोकि अब अब्बासी भी लिखते है), आर्फी (फ़क़ीर), आर्फी बिरादरी के लोग मंगलौर में सिकन्दरपुर सहित कई अन्य जगहों से यहां आकर बसे हैं। इन्हें हजरत सय्यद आरिफ अली शाह (शाहे मरदां देहली) की निस्बत से आर्फी कहा जाता है। क्योंकि यह लोग हजरत सय्यद आरिफ अली शाह के हाथों पर इस्लाम में दाखिल हुए थे। कूंजडे, मनीहार, दर्जी, हलवाई, राजपूत सूनार, धोबी, गुज्जर, कुम्हार, मुल्तानी, मुस्लिम सैनी (इस बिरादरी के लोग शूरू से ही काश्तकारी का कार्य करते आये हैं, पूर्व में प्रसिद्व केले और पोंडे व चने की काश्त यही लोग किया करते थे, लेकिल यह काश्त पिछले 50 वर्षों में विलुप्त हो चुकी है। इस समय भी इस बिरादरी के अधिकतर लोग सब्जी की ही काश्त करते हैं), भंसकोड (पूर्व नाम बांसतराश है यह लोग बांसो का तराश कर कंडी, ताज़िये, चिक़ आदि बनाते थे, अधिकतर यह लोग मंगलौर से पलायन करके ज्वालापुर आदि में जा बसे है। ज्वालापुर के प्रसिद्व शायर रविश सिद्दीक़ी ज्वालापुरी का सम्बंध भी इसी बिरादरी से है, सैफी, लूहार (जिन्हें खरादी के नाम से भी जाना जाता है), हज्जाम (नाई जोकि अब सलमानी लिखते हैं, इन लोगों की आमद भी भगवानपुर सहित कई अन्य जगहों से हुई है), नीलगर, शेख ढपाली, पोंबे आदि बिरादरी के मुसलमान बसते हैं। मंगलौर में बसने वाली अधिकतर बिरादरियों के नाम उनके कार्यों से जाने जाते हैं। चन्द बिरादरियों को छोडकर बाकी बिरादरियां कब मंगलौर में बसी और किस जगह से आये यह मुस्तनद और पुख्ता रिकार्ड प्राप्त नहीं हो सका है। मगर 1867 के बन्दोबस्त में कदीमी तौर पर कुछ बिरादरियों का जिक्र जरूर मिलता है।
इसी तरह हिन्दुओं में भी ब्राहमण, वैश्य, खत्री, पाल, कश्यप, कायस्थ, (मोहल्ला कायस्थान इसी हिन्दू जाति से मन्सूब है, इसी कायस्थ बिरादरी के कालका प्रशाद भटनागर आगरा विश्वविधालय के कुलपति भी रहे हैं, वहीं बताया जाता है कि इस बस्ती के एक ओर शिक्षा विद्वान श्रीलंका में न्यायाधीश भी रहे हैं)। नाई, माली, छिम्मी, दलित, चमर जोलाहे, जैन, त्यागी, धीमान, सूनार, कुम्हार, जाटव, जाट, गुज्जर, सैनी, पटवे, पंजाबी, भागलपुरी आदि जाति के लोग आबाद हैं। इनमें ब्रहमणों जैनियों का सम्बंध मंगलौर से सबसे पुराना है।
हां में वही मंगलौर हूं, जिसमें आज भी जातिप्रथा मौजूद है। हिन्दूओं में आज भी सभी अलग अलग गोत्र से विवाह करते हैं। जबकि मुसलमानों में भी जातिप्रथा का प्रचलन हैं मगर इस अन्तर के साथ कि मुसलमान गोत्र में भी विवाह शादी करते हैं। यहां वार्ड सभासद के चुनाव से लेकर लोकसभा के चुनाव तक हर चुनाव में बिरादरीवाद का बोलबाला रहता है। हर व्यक्ति में जात बिरादरीवाद कूट कूट कर भरा हुआ है, कई अवसर ऐसे भी आते है कि यह बिरादरीवाद ही बिरादरी विवाद में बदल जाता है, और प्रतिनिधि भी इसका शिकार हो कर नाइंसाफी कर बैठते हंै। जबकि बिरादरीवाद में कोई बुराई नहीं बल्कि बुराई बिरादरी विवाद में हंै। इस बिरादरीवाद को बढावा देने में यहां के सियासतदानों ने न केवल अहम भूमिका निभाई है बल्कि अपने सियासी वजूद को बरक़रार रखने में खूब महनत की है, काश इतनी महनत और लगन अगर यह राजनेता मंगलौर को शिक्षित करने, उसके विकास पर देते तो आज मंगलौर एक नया और शिक्षित नगर होता। इतिहास इस बात की गवाही देता है कि अगर मंगलौर में नेहरू राष्ट्रीय इंटर काॅलेज न होता तो शायद आज जो शिक्षित लोग नजर आते हैं वह भी न होते।
हां में वही मंगलौर हूं, जिसके वासी पढ़ाई से अधिक खेलकूद में दिलचस्पी रखते हैं। मध्यकाल में घुडदौड, बैलगाडी दौड, मुर्गे लडाना, रिक्शा दौड, दंगल, तीतर लडाना, कबूतरबाजी, कबडडी, शिकार करना, गुलेल चलाना, शतरंज आदि मुख्य थीं। वर्तमान में भी क्रिकेट, शुटिंग बाल, दंगल, बैट मिन्टन, काले पीले डंडे, आदि खूब खेले जाते हैं। दंगल की वजह से पहलवानी का भी खूब शोक़ रखते हैं। पूर्व में मरहूम सज्जाद पहलवान, (बताया जाता है कि सज्जाद पहलवान की एक एक पसली चार उंगल के बराबर थी), कन्हया पहलवान, नूदी पहलवान (नूदी पहलवान के कारनामे देख कर एक गोरी भी फिदा हो गई थी), झांजी पहलवान, हबीब पहलवान, बशीर पहलवान, यूनुस पहलवान, का बोलाबाला रहा है।
     हां में वही मंगलौर हूं, जिसमें सभी लोग सामाजिक तौर पर बहुत ही मिलनसार हैं। यह मिलनसारी की वजह है कि यहां कभी सामप्रदायिक या जातिय झगडा नहीं हुआ। आज तक यहां कोई भी ऐसा मामला प्रकाश में नहीं आया जिससे किसी की आस्था को ठेस पहुॅची हो। एक समय ऐसा भी था यहां कि जब मस्जिदों में अजान होती थी, तो चैधरी आन्नदपाल मंदिरों में बजने वाली धंटियों को बन्द करा दिया करते थे। जिन्हें लोग आज भी हिन्दू मुस्लिम एकता के धनी के नाम से जानते हैं। इसी तरह लन्ढौरा रोड पर होने वाले सीरत के जलसे की देखभाल भी फूल सिंह किया करते थे। यहां के वासी सांस्कृतिक धार्मिक कार्यक्रमों के भी शोकीन हैं। मुसलमानों में धार्मिक जलसे, मुशायरे, कव्वाली आदि को आयोजन कराते रहे हैं। यहां के मुशायरों में जिगर मुरादाबादी, असगर गोंडवी (जोकि काज़ी अब्दुल गनी के अनुयायी थे) आया करते थे। मिलाद शरीफ, उर्स शाह विलायत, उर्स हाफिज पानीपती, उर्स शाह अशरफ, जलसा सिरतुन्नबी, जश्ने इमाम हुसैन, योमे अली, यौमे अब्बास, यौमे फातमा आदि जैसे धार्मिक आयोजन किये जाते हैं। जिनमें मुसलमान, हिन्दू गोया हर समुदाय के लोग शिरकत करते हैं। इसी तरह हिन्दूओं में रामलीला, कृष्णलीला, कीर्तन, जागरण, भजन, रविदास जयंती, बालमिकि जयंती, अग्रसैन जयंती का आयोना किया जाता रहा है। रामलीला में बडा जूलूस निकलता है, जिसमें मार्शल आर्ट का प्रदर्शन किया जाता है। यहां के रामलीला जूलूस को एक यह भी प्रमुख्ता प्राप्त रहा है कि रामलीला जूलूस में देहरादून का प्रसिद्व अल्ताफ बैंड शामिल होता था। यहां मुसलमानों में सुन्नी, शिया दो पöति हैं। हिन्दुओं में भी सनातन पöति व आर्यसमाज पöति है। इसी तरह मंगलौर के जैनियों में पहले दो दिगम्बर पöति एंव पीताम्बर पöति के लोग बसते थे, अब केवल दिगम्बर पöति के चन्द लोग ही हैं। हिन्दू समाज  के अधिकतर लोग मंगलौर से पलायन करके रूडकी आदि शहरों में जा बसे हैं।
       हां में वही मंगलौर हूं, जिसमें बुजुर्गों के लगभग 14 मज़ारात है। जबकि यहां किसी देवी देवता का कोई विशेष तीर्थस्थल तो नहीं है। मगर देवी माता का एक मन्दिर जरूर है, जिसे स्थानीय लोग तीर्थस्थल के रूप में ही मानते हैं। माता का मन्दिर एक प्राचीन मन्दिर है। जिसे शीतलमाता का मन्दिर भी कहा जाता है। स्थानीय लोगों का मानना है कि स्थानीय माताऐं उसमें प्रवेश करती हैं। इनके अलावा पिपलेश्वर महादेव मन्दिर, हनुमान मन्दिर, राधा कृष्ण प्राचीन मन्दिर, मंसा राम मन्दिर, शिव जी प्राचीन मन्दिर, सांई बाबा मन्दिर, सहित अनेक मन्दिर हैं। वहीं कई शिक्षण संस्थाओं सहित सार्वजनिक जगहों में भी पूजा स्थल के रूप में मन्दिर बने हुए हैं। बाकी अगली किस्त में……………………..

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